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खाली भवन में रातोंरात हृदय रोग के कुछ मरीजों को ट्रांसफर किया, ज़िद से डाली आईजीआईसी की नींव

डॉ.समदर्शी बताते हैं कि पिता जी का जन्म 30 दिसंबर 1919 को समस्तीपुर जिले में हुआ और देहांत दो नवम्बर 2010 को। समस्तीपुर के...

Dainik Bhaskar

Jan 02, 2017, 02:05 AM IST
खाली भवन में रातोंरात हृदय रोग के कुछ मरीजों को ट्रांसफर किया, ज़िद से डाली आईजीआईसी की नींव
डॉ.समदर्शी बताते हैं कि पिता जी का जन्म 30 दिसंबर 1919 को समस्तीपुर जिले में हुआ और देहांत दो नवम्बर 2010 को। समस्तीपुर के किंग एडवर्ड हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा के बाद पटना साइंस कॉलेज में 1936 से 1938 तक छात्र रहे। फिर तब के प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (अब पीएमसीएच) से 1944 में एमबीबीएस किया। 1947 में उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए फिर स्टॉकहोम, स्पेन, जर्मनी, अमेरिका गए। वहां से एमडी, डीएससी की उपाधियां पाई और हृदय रोग विशेषज्ञ बने। विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद स्वदेश लौटे ताकि अपनी शिक्षा का लाभ बिहार के मरीजों को मिल सके। पटना आकर पीएमसीएच के मेडिसीन विभाग में सेवा शुरू की।

कार्डियोलोजीकी नींव डाली

डॉ.श्रीनिवास ने कार्डियोलॉजी का प्रशिक्षण हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मैसाच्यूसेट्स जनरल हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजी के फादर कहे जाने वाले डॉ. पॉल डूडले वाइट की देखरेख में लिया था। यह प्रशिक्षण पाने वाले वह पहले और अंतिम भारतीय थे। यह वह वक्त था जब अमेरिका के बाहर के देशों में कार्डियोलॉजी का विशेषज्ञ इलाज नहीं होता था। 1940 से 1950 के बीच विभिन्न देशों के डॉक्टर उनसे प्रशिक्षण लेने के लिए आए और अपने देशों में जाकर कार्डियोलोजी स्पेश्यलिटी की नींव डाली। इस तरह डॉ. श्रीनिवास भी वहां से प्रशिक्षण लेकर वापस भारत आए और देश में कार्डियोलॉजी विशेषज्ञता की नींव डाली। इससे पूर्व भारत में जनरल फिजिशियन ही हृदय रोगों का भी इलाज करते थे।

नए साल पर पूछते- बताएं कि मैं खुद में क्या सुधारूं

डॉ.समदर्शी बताते हैं कि डॉ श्रीनिवास बड़े ही दयावान व्यक्ति थे। उनका मानना था कि समाज के किसी भी तबके का आदमी या किसी भी जाति-धर्म का आदमी उनके पास अगर मदद की उम्मीद लेकर आता है तो वह निराश नहीं लौटे। वह बताते हैं कि पटना हाईकोर्ट की चारदीवारी से सटी एक झोपड़ी थी, उसमें नागाराम नाम के एक दलित व्यक्ति रहते थे। पोती मानकी की शादी के समय नागाराम ने डॉ. श्रीनिवास से मदद मांगी। नागाराम की बातें सुनने के बाद उन्होंने शादी के खर्च के बराबर रकम का चेक काट कर दिया। बाद में नागाराम के आग्रह पर उन्होंने मानकी का कन्यादान भी किया। इसके बाद मानकी परिवार के सदस्य की तरह बनी रही। वह बताते हैं कि डॉ. श्रीनिवास के एक मरीज थे सैयद काजिम हुसैन जार अजीमाबादी। उन्होंने एक बार कहा कि डॉक्टर साहब हम शायर लोग हैं, हमारे पास ज्यादा पैसा तो है नहीं। पता नहीं मरने के बाद कफन या मजार भी नसीब हो या नहीं। अजीमाबादी साहब के देहांत के बाद डॉ. श्रीनिवास ने उनकी मज़ार बनवाई। डॉ. समदर्शी बताते हैं कि वह हमेशा नए वर्ष के मौके पर परिवार के सदस्यों से कहते कि आप लोग मुझे लिखकर दीजिए कि कैसे मैं खुद को अधिक सुधार सकता हूं। परिवार वाले जो सुझाव देते, उसे वह जीवन में उतारने की कोशिश करते।

1893 में शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व स्वामी विवेकानंद ने किया था। 100 साल बाद 1993 में प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. श्रीनिवास ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। वहां उन्होंने विश्व धर्म या सनातन धर्म पर अपना व्याख्यान दिया। देशभर में एक विख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ के तौर पर इनकी पहचान थी। इनके मरीजों में दलाई लामा समेत देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, नेपाल के राज्याध्यक्ष अादि शामिल थे। डॉ. श्रीनिवास इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान के संस्थापक थे। पिछले 30 दिसंबर को उनकी जयंती थी। इस मौके पर अमेरिका से आए उनके हृदय रोग विशेषज्ञ पुत्र डॉ. तांडव आइंस्टाइन समदर्शी से हमने जाना उस शख्सियत के बारे में।

अपनी प|ी श्रीमती किशाेरी सिन्हा के साथ। यह तस्वीर 1981 की है।

कहते थे- इंसान की पहचान काम से हो

पिताजी ने कार्डियोलॉजी का प्रशिक्षण पाकर अमेरिका से 1948 में जब वापस लौटे तो पहला काम किया अपना सरनेम सिन्हा हटाया। उनका मानना था कि सरनेम या फैमिली नेम से अलग होकर इंसान की पहचान होनी चाहिए। मेरा नाम तांडव आइंस्टाइन समदर्शी और हमारे बड़े भाई का नाम भैरव उस्मान प्रियदर्शी नामकरण इसी सोच के तहत किया। हमेशा हमें कहते थे कि हर व्यक्ति और धर्म समान है। धर्म और जाति के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं होना चाहिए। हमारे घर के मध्य में एक छोटा पूजा घर था। इसमें हर मुख्य धर्म के भगवान, गुरु, पैगंबर की मूर्ति या चित्र रखा रहता था। इसमें गीता, रामायण के अलावा कुरान और बाइबिल भी रखी रहती थी। 70 साल की उम्र में उन्होंने खुद से उर्दू पढ़ा और इसमें पारंगत बने।

ज्येष्ठ जामाता डॉ. अखिलानंद ठाकुर के साथ। यह तस्वीर 1999 की है।

डॉ. समदर्शी बताते हैं कि डॉ. श्रीनिवास पीएमसीएच में कार्यरत थे, यहां उनकी विशेषज्ञता का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा था। हृदय रोग के मरीजों को वह बेहतर सुविधा देना चाहते थे। आज जहां आईजीआईसी है, वहां एक मकान खाली पड़ा था। एक रात उन्होंने अपने कुछ हृदय रोग के मरीजों को शिफ्ट कर दिया। इसके बाद तो पूरे पीएमसीएच प्रशासन में हड़कंप मच गया। कई ने कहा कि डॉ. साहब ने तो इस मकान को हड़प लिया। अगले दिन सुबह डायरेक्ट हेल्थ सर्विसेज डॉ कर्नल बीसी नाथ ने अपने कार्यालय में बुलाकर कहा कि क्या आप को नौकरी नहीं करनी है आप ने ऐसा क्यों किया। इसके बाद डॉ श्रीनिवास ने जो जवाब दिया उससे वह काफी प्रभावित हुए और तुरंत अस्पताल प्रशासन से उस मकान में मरीजों के लिए तमाम सुविधाएं मुहैया कराने का आदेश दिया। कुछ दिनों बाद ही डॉ. श्रीनिवास तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिले और उन्हें कहा कि देश में हृदय रोगों का कोई अलग से अस्पताल नहीं है। मैं चाहता हूं कि आप के नाम पर देश के इस पहले अस्पताल का नाम हो। इंदिरा ने जब सहमति दी तो कहा कि क्या आप चाहेंगी कि जिसका नाम आपके नाम पर हो, वह बड़ा अस्पताल बने। इनकी बात सुन इंदिरा ने मुस्कराते हुए कहा कि बताएं कितना पैसा चाहिए। इसपर डॉ श्रीनिवास ने कहा कि 10 करोड़। इस तरह से उनके प्रयासों से इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान बनकर तैयार हुआ और आज देश का प्रमुख अस्पताल है। डॉ. समदर्शी कहते हैं कि पिता जी से इलाज कराने के लिए देश के दूरदराज इलाकों से मरीज पटना आते थे। हृदय रोगों के विख्यात डॉक्टर होने के बावजूद उनकी अन्य चिकित्सा पद्धतियों में भी दिलचस्पी थी। 1960 में विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को मिलाकर पोलीपैथी का बिगुल बजाया। उन्होंने आधुनिक औषधि विज्ञान और दूसरी चिकित्सा पद्धतियों को मिलाकर चिकित्सा करने की बात कही थी।

पिताश्री रामप्यारे शरण सिंह, गढ़ सिसई। यह तस्वीर 1965 की है।

डॉ. श्रीनिवास अपने पौत्र डॉ. सत्य सनातन श्रीनिवास के साथ। यह तस्वीर 1982 की है।

परिजनों का सान्निध्य : अपने बंधुओं के साथ डॉ. श्रीनिवास (बाएं से) डॉ. सच्ची निवास सिंह, डॉ. श्रीनिवास, श्री गिरीश निवास सिंह, श्री रवि निवास सिंह एवं ललित निवास सिंह। कनिष्ठ पौत्र पराकाश परमेष्ठी प्रतिभू, डॉ. श्रीनिवास की गोद में तथा ज्येष्ठ पौत्र सत्य सनातन श्रीनिवास, ललित निवास सिंह की गोद में। यह तस्वीर 1983 की है।

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