• Home
  • Bihar
  • Patna
  • अंजनी बाबू शरमा रहे थे मैंने पकड़ कर रंग दिया
--Advertisement--

अंजनी बाबू शरमा रहे थे मैंने पकड़ कर रंग दिया

मैं संकोची स्वभाव की रही थी। जब ससुराल गई तो होली में देवर, भाभी के रिश्तों में ज्यादा खुलापन नहीं था। इसलिए पहली...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 02:10 AM IST
मैं संकोची स्वभाव की रही थी। जब ससुराल गई तो होली में देवर, भाभी के रिश्तों में ज्यादा खुलापन नहीं था। इसलिए पहली होली पति के साथ ही मनी। इसके बाद ननद, भौजाई व जेठानी के साथ। बेगूसराय जिले के चमथा में मेरी ससुराल है। वहां सब ने मुझे पकड़ कर रंगों से भिंगो दिया। पति (अंजनी कुमार सिंह) को पहली बार रंग लगाया तो वे खूब शरमा रहे थे, लेकिन मैं कब मानने वाली थी। उन्हें खूब रंग लगाया। अभी भी मेरी होली की शुरुआत पति को रंग लगाने के साथ ही शुरू होती है। वे गंभीर हैं और आसानी से खुलते नहीं, लेकिन उन्हें पता है कि मैं तो उन्हें होली में रंग लगा कर ही रहूंगी। मेरा मायका पटना के चकबैरिया में है। मायके की होली की खूब याद है। होली में हम सब बैठकर चना छीलते थे और पिता चौकी पर थाप देकर फाग गाते थे। बिहार के चीफ सेक्रेट्री अंजनी कुमार सिंह की वाइफ पूर्णिमा शेखर यह बताते हुए पहले गुनगुनाने और फिर गाने लगती हैं... नकबेसर र कागा ले भागा, सैंया अभागा न जागा। एक दूसरा गीत भी वह उसी अंदाज में गाती हैं- उड़त गुलाल लाल भय बादर रहत लाल- सकल देशी छाए मनहु मधवा झरि लाई.... ब्रज में ऐसी होली मचाई। कहती हैं कि बचपन में होली में नए कपड़े पहनती थीं, चने का, आलू का बचका खूब खाती थीं। हर होली में किसी न किसी बहाने फगुआ के गीत गा ही लेती हैं।

डॉ. पूर्णिमा शेखर सिंह, अध्यक्ष, आईएएस ऑफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन

डीजीपी की लव लाइफ ने चढ़ाया प्यार का रंग

शादी के बाद की पहली होली तो मेरे लाइफ की सबसे यादगार होली है। बहुत मीठी याद है। उस समय पति (के.एस. द्विवेदी) प्रोबेशन पर हैदराबाद एकेडमी में थे। मैं ससुराल उड़ई बुंदेलखंड आई हुई थी। उसी समय पति एक हफ्ते के लिए आए थे। इस बीच होली भी आ गई। मायके से और बाकी लोगों ने कहा कि पहली होली ससुराल में नहीं मनाई जाती मायके में मनती है, लेकिन ससुराल में मजाक के सभी रिश्तों ने प्यार भरी जिद पकड़ ली कि नहीं पहली होली में मायके नहीं जाना है। ससुराल में ही रहना है। पति भी ससुराल में थे तो मेरा भी मन मायके जाने का नहीं हुआ। मैं संकोच से कुछ बोल नहीं पा रही थी। ससुराल के सब लोगों ने जब जिद पकड़ ली तो मुझे भी अच्छा लगा। मैं ससुराल में ही रुक गई पहली होली में। ननद, देवर सब के साथ खूब होली मैंने खेली। जो देवर मुझे रंग लगाते मैं कहती साड़ी दोगे ना? सबने गिफ्ट भी किया। ननद भी तब कुंवारी थीं। खूब प्यारी होली थी वह। पति को तो मैंने खूब प्यार से रंग लगाया। मैं खूब शरारती थी। मेरे मायके झांसी से उड़ई की दूरी बहुत कम है फिर भी मैं होली में मायके नहीं गई, वह इनके प्यार का ही रंग था। वह प्यार का रंग आज भी कायम है।

शक्ति द्विवेदी,

बिहार के नए डीजीपी केएस द्विवेदी की प|ी

प्रस्तुति : प्रणय प्रियंवद