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डर लगता रहा हौज वाली उस होली से

शादी के बाद जब मैं ससुराल गई तो वहां गांव के देवर सब आते थे होली खेलने। हौज वाली होली वहां प्रसिद्ध थी। मुझे इस होली...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 02:10 AM IST

डर लगता रहा हौज वाली उस होली से
शादी के बाद जब मैं ससुराल गई तो वहां गांव के देवर सब आते थे होली खेलने। हौज वाली होली वहां प्रसिद्ध थी। मुझे इस होली से काफी डर लगता था। मैं दुल्हन थी। पति डॉ. बी. के. सिन्हा को होली खेलना बहुत पसंद रहा है। पहली होली में वे रंग लेकर आए। झीकाझोरी ऐसी हुई कि मेरे एक कान का झुमका खुल कर गिर गया। मैं बोलती रही पर वे यही कह कर रंग लगाते रहे कि झुमका तो मिल ही जाएगा पहले रंग तो लगवा लो। जब रंग साफ किया तो फिर से उन्होंने रंग लगा दिया। मेरा ज्यादा कर्मक्षेत्र समस्तीपुर रहा है। यहां मैंने होली को बहुत इंज्वाय किया। वहां एक दिन पहले आधी रात से पकवान, रंग सब की तैयारी होने लगती थी। गाना-हंगामा खूब चलता था। हम टोलियों में निकल पड़ते थे। नई बहुओं को भी साथ रखते थे और सभी परिजनों के घर-आंगन में जाते थे।

पकवान खाते थे और बैठ कर गाते थे। अभी भी मैं उस होली को मिस करती हूं। शाम होते-होते फाग गाने वाले घर पर आ जाते थे। बचपन की एक चीज मुझे खूब याद है। पहले घर में मां-पिताजी हम पर रंग छींटते थे उसके बाद हम छोटी बाल्टी, छोटी पिचकारी और रंग की पुड़िया ले होली खेलने पास पड़ोस में जाते थे। मेरे पति को होली खूब पसंद रहा। वे भी खूब मस्ती करते रहे हैं होली में।

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Web Title: डर लगता रहा हौज वाली उस होली से
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