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एयरपोर्ट पर मिली नवजात, पूछ रही सवाल-मां! क्या है मेरा कसूर...

हवाई अड्‌डा पर शनिवार को एक नवजात मिली। देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जुट गई।

लक्ष्मीकान्त दुबे/ततहीर कौसर | Last Modified - Nov 05, 2017, 06:46 AM IST

  • एयरपोर्ट पर मिली नवजात, पूछ रही सवाल-मां! क्या है मेरा कसूर...
    भागलपुर.हवाई अड्‌डा पर शनिवार को एक नवजात मिली। देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जुट गई। कोई उसकी मां के बारे में तरह-तरह की बातें कर रहा था, तो कोई उसकी हालत पर तरस खा रहा था। लेकिन ये मासूम तो अपनी मां से यही पूछ रही थी कि आखिर उसका क्या कसूर था? क्या उसे केवल इसलिए फेंक दिया कि वह बेटी है। बेटी होने की वजह से उसे दूसरों के रहमोकरम पर ही छोड़ना था तो मुझे लावारिस की तरह जन्म ही क्यों दिया? मुझे पैदा होने से पहले ही मार क्यों नहीं दिया। या, क्या मैं तुम्हारे नासमझ प्यार की पैदाइश थी।
    फिर जब तुम्हारे सामने दुनिया का सामना करने की हिम्मत ही नहीं थी, तो तुमने प्यार में हदों को पार ही क्यों किया? और जब ज़माने के सामने तुम्हारी असलियत खुलने का मौका आया, तो तुम मुझे चुपचाप लावारिस की तरह जन्म देकर निकल गईं। मुझे यूं ही तिरस्कृत करना था तो नौ महीने कोख में क्यों रखा? क्यों नहीं मेरे जन्म पर बधाई के गीत गाए गए। हवाईअड्डा पर मिली लावारिस नवजात के उम्र की दहलीज अगर सोचने की होती तो कुछ ऐसे ही सवाल शायद उस अबोध के जेहन में तैर रहे होते। फिलहाल नवजात को वहां से गुजर रही एक महिला ने मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया है। उसे बच्चों के आईसीयू में रखा गया है। चिकित्सकों के अनुसार, ठंड में रहने की वजह से निमोनिया होने का खतरा है।
    तमाशाई लोगों के बीच अपनों को तलाश रही थीं आंखें
    इस नवजात ने भी तो अपनी मां के पेट में नौ महीने रहने के दौरान दुनिया में आने का ख्वाब देखा था। सपनों भरी दुनिया में उसने अपने लिए कई ख्वाब सजाए थे। मां की कोख के बाद वो उसके आंचल में समां जाने को बेकरार थी। मां से लोरी सुनकर वो सपनों की दुनिया में खो जाना चाहती थी। और अपने पापा की उंगली पकड़कर पूरी दुनिया का चक्कर लगाना चाहती थी। उसकी भी तमन्ना थी की ज़मीन पर कदम रखने के बाद उसे भी गुड्डे-गुड़ियों से खेलने का मौका मिले। लंबे इंतजार के बाद आखिर वो लम्हा भी आया जब उसने दुनिया में कदम रखा। पहली बार आंख खोली तो उसकी तमन्ना उस मां को देखने की थी, जिसने उसे इतने जतन से अपनी कोख में पाला था। लेकिन यहां तो मां कहीं थी ही नहीं। उसने ज़मीन पर कदम भी रखा तो लावारिस की तरह। न तो उसे मुलायम बिस्तर मिला और न ही मां की गोद मिली। और न ही उसके जन्म का इंतजार करने वाले पापा की बेकरारी को ही वो देख सकी। उसकी आंखें बदहवास सी अपनों को तलाशने लगीं। लेकिन उसके चारों तरफ तो तमाशाई खड़े थे। लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे थे। लेकिन किसी को भी उसकी मां का पता नहीं था।
    अनाथालय पहुंचने वालों में 70 प्रतिशत बच्चियां ही
    हम कितने ही दावे करें कि लड़की लक्ष्मी का रूप है लेकिन सच्चाई इसके बिलकुल अलग है। तमाम दावों के बीच हमारे देश में आज भी कई जगहों पर जन्मते ही लड़कियों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। भागलपुर अनाथालय में इस समय 54 बच्चे हैं। इनमें से 40 बच्चियां हैं। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि समाज में बेटियों को लेकर अभी भी क्या सोच है।
    अनाथ बच्चियों को गोद लेने वाले भी कम नहीं
    यूं तो अनाथालय में सबसे ज्यादा नवजात बच्चियां या लड़कियां ही आती हैं, मगर इन बच्चियों को गोद लेने वालों की संख्या भी कम नहीं है। अनाथालय से पिछले कुछ साल में 72 बच्चों को अलग-अलग जगहों के लोगों ने गोद लिया है। इन 72 बच्चों में 58 बच्चियां ही हैं। यानी जिन्हें लड़की समझकर समाज का एक वर्ग लावारिस छोड़ देता है उन्हें अपनाने वालों की संख्या भी कम नहीं है।
    बेटियों ने बताया किसी से कम नहीं हैं
    लावारिस हालत में नवजात के मिलने के बाद कई सवाल उठने लगे हैं। मसलन क्या उसे सिर्फ इसलिए फेंक दिया गया कि वह बेटी थी। आखिर इसी शहर में तमाम ऐसी बेटियां भी तो हैं जिन्होंने साबित किया है कि वे किसी भी सूरत में बेटों से कम नहीं हैं। हम बता रहे हैं ऐसी ही कुछ बेटियों की सफलता की कहानी जिन्होंने माता-पिता और शहर का नाम रोशन किया है।
    जिम्मी पराशर, 5 नेशनल गेम खेली: जिम्मी पराशर वॉलीबाल में पांच नेशनल गेम्स खेल चुकी है। 2006 में छत्तीसगढ में नेशनल गेम से सफर की शुरुआत की जो अब तक जारी है। जूली, जज बन गई: अपने चपरासी पिता जगदीश साह की लाडली जूली ने 29वीं बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में 24वां स्थान हासिल कर जज की कुर्सी अपने नाम कर ली।
    जैसमिन दूर कर रही असमानता: जूही जैसमिन झा शहर की बेटियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रही हैं। गरीब बच्चों को भी वे पढ़ाने में मदद कर रही हैं।
    अनाथालय से उच्च शिक्षा को पहुंची पुणे
    लगभग 15 साल पहले भागलपुर अनाथालय में एक लावारिस बच्ची को लाया गया था। उसे दोनों आंखों से नजर नहीं आता था। बावजूद इसके वह अनाथालय में शुरू की। लगभग आठ साल पहले डॉ सुजाता चौधरी अनाथालय आई थीं। उनकी नजर बच्ची पर पड़ी। उसकी प्रतिभा को देख उन्होंने उसे पढ़ाने की जिम्मेदारी ली। आज वह बच्ची पुणे में उच्च शिक्षा हासिल कर रही है।
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