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अनिल विश्वास ही आरकेस्ट्रा को लोगों के बीच लाए

अर्थशिला की ओर से बिहार म्यूजियम में ‘धुनों की यात्रा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लेखक और संगीत विशेषज्ञ पंकज...

Danik Bhaskar | Sep 10, 2018, 05:11 AM IST
अर्थशिला की ओर से बिहार म्यूजियम में ‘धुनों की यात्रा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लेखक और संगीत विशेषज्ञ पंकज राग ने इस यात्रा में “हिंदी संगीत की बदलती प्रवृत्तियां’ पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि 1931 के बाद संगीत यात्रा शुरू होकर आज के समय तक बढ़ती चली आई है और इसने बहुत संजीदगी से हमारे समाज को प्रभावित किया है। कार्यक्रम की शुरुआत में दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें..., गाने से हुई। उन्होंने बताया कि पहले भाव को ढोलक, बांसुरी, हरमोनियम से अभिव्यक्त किया जाता था। उस वक्त की स्वर रचना बहुत ही आसान होती थी। रागों को मिश्रित कर कई राग बनाए जाते थे। पहले म्यूजिशियन कोठों से आया करते थे और वे वैसे ही गाना गाया करते थे। उन्होंने बताया कि पहली बार फिल्म अमृत मंथन में गानों पर प्रयोग किया गया था। इसके बाद भी कई गाने आए, जिनमें अलग-अलग प्रयोग किए गए। इस मॉडर्न जमाने में लोग रवीन्द्र संगीत, ठुमरी, लोकसंगीत, माउथआर्गन और पियानो बजाते हैं। इसी मॉडर्निटी में पंकज मलिक का गाना ये कौन आज आया सबेरे-सबेरे..., काफी मशहूर हुआ। स्वतंत्रता का असर संगीत पर भी काफी पड़ा। उन्होंने कहा कि पहली बार अनिल विश्वास ही आरकेस्ट्रा को लोगों के बीच लाए। इस बीच उन्होंने संगीत यात्रा में आज तक के सफर को गाने के जरिए बताए।

‘धुनों की यात्रा’ पर ले गए संगीत विशेषज्ञ पंकज राग, 1931 के बाद के संगीत का सफरनामा सुनाया