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पहली बार मंच पर उतरीं दादी-नानी की उम्र की महिलाओं की एक्टिंग देख दंग हुए दर्शक

Patna News - वैसे तो कालिदास रंगालय में नए कलाकारों या बाहर से आए कलाकारों का नाटक हमें देखने को मिल जाता है, लेकिन रविवार की शाम...

Nov 11, 2019, 09:46 AM IST
वैसे तो कालिदास रंगालय में नए कलाकारों या बाहर से आए कलाकारों का नाटक हमें देखने को मिल जाता है, लेकिन रविवार की शाम कालिदास रंगालय में पहली बार कुछ अद्भुत सा दृश्य दिखा। अभिनय से कोसों दूर गांव में रहने वाली जीवन से थकी-हारी दादी और नानी की उम्र की महिलाओं ने नाटक कर सभी को हैरत में डाल दिया। देखने वाले दर्शक दांतों तले उंगली दबाकर एक टक से देखते रहे। नाटक के बारे में सुन कर लोगों की अच्छी-खासी भीड़ भी जुटी थी। वैसी महिलाओं ने दर्शकों के बीच अभिनय किया, जो आज से पहले कभी घर से बाहर नहीं निकलती थीं। इनका जज्बा देख बैठे दर्शक आश्चर्यचकित रह गए। इस नाटक के सभी किरदार महिलाओं ने ही निभाया। वे महिलाएं जो आजतक सिर्फ साड़ी में दिखती थीं, मंच पर वे धोती, कुर्ता और पजामा में दिखीं। एक घंटा 45 मिनट चले इस नाटक को देखने के लिए लोग पूरे समय तक अपने सीट पर जमे रहे। अवसर था कुमार प्रतिभा प्रतिष्ठान संस्था, नौबतपुर की ओर से नाटक ‘देख तमाशा बुढ़िया का’ के मंचन का। सचिन चंद्रा लिखित, परिकल्पित और निर्देशित नाटक ने दर्शकों के बीच एक अलग छाप छोड़ी। खासकर दर्शकों में कुछ महिला कलाकार भी इनके अभिनय को देखने पहुंची थीं। नाटक की कहानी गांव की बुढ़िया और उसकी पोती मुनिया पर आधारित है। मुनिया पढ़ने की बहुत इच्छा रखती है, लेकिन उसे जबरन घर में रखा जाता है। एक दिन वह पढ़ने के लिए किताब कॉपी की डिमांड करती है, लेकिन उस पर ऐसा अत्याचार किया जाता है जैसे दादी से उसने पूरी संपत्ति ही मांग ली हो। दुख की बात यह थी कि दादी के आगे मुनिया के मां-बाप का भी नहीं चलता था। मुनिया यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाती तो घर से दूर चली जाती, वहीं उसके मां-बाप दुख में रहते। ये सब देख बूढ़ी दादी जश्न मनाती थी।

एक दिन किसी के बहकावे में आकर दादी दस लाख रुपए के दहेज के लोभ में अपने नालायक पोते की शादी तय कर देती है। अंत में दहेज भी नहीं मिलता और पुलिस दहेज लेने के जुर्म में जेल ले जाती है। ये सब सदमा बुढ़िया बर्दाश्त नहीं कर पाती है और उसे हार्ट अटैक आ जाता है। तब मुनिया सुनकर आती है और भाई के दिए बचे पैसे से दादी की जान बचाती है। तब दादी का घमंड टूटता है और मुनिया को हमेशा के लिए अपना लेती है। नाटक में ग्रामीण महिलाओं ने भी दहेज लेने और देने दोनों पर विरोध किया। साथ ही महिलाओं के हक के लिए आवाज भी उठाई। यह पूरा नाटक मगही भाषा में था।

stage show

सिटी रिपोर्टर. पटना

मंच पर


गांव के लोग देते थे ताने, फिर भी मन में ठान कर सीखा अभिनय

नाटक में अभिनय कर रही महिलाओं में 65 वर्षीय उमा देवी ने बताया कि अभिनय करना और डायलॉग बोलना हमारे लिए चैलेंजिंग था। अभिनय नहीं होने पर हम कई बार घर भाग जाते थे, लेकिन निर्देशक सचिन हमें बोलचाल की भाषा में समझाते थे। सही भी नहीं होता था, तब भी हौसला बढ़ाते कि बहुत अच्छा हो रहा है। फिर ऐसे ही हमारा हौसला बढ़ता गया धीरे-धीरे सीखते गए। 50 वर्षीय संजू देवी ने बताया कि हमने दो महीने में यह नाटक सीखा है। इतना उमंग था इसे लेकर कि हम सुबह जल्दी खाना बनाकर सीखने चले जाते और फिर देर रात तक सीखते थे। 62 वर्षीय शयामपरि देवी ने बताया कि गांव के पुरुष ताने देते कि अब ये महिलाएं स्टेज पर कुर्ता-पजामा पहन कर सबके सामने एक्टिंग करेंगीं। फिर हम सब ने मिल कर ठान लिया कि इसे पूरा कर ही छोड़ेंगे।

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