ग्लूकोमा से बचाव के लिए अस्पतालों में चलाया जा रहा जागरुकता अभियान
आंखों की रोशनी के लिए बड़े खतरे के रूप में चिह्नित ग्लूकोमा धीरे-धीरे पांव पसार रहk है। शुरुआती दौर में इस बीमारी का खास लक्षण सामने नहीं आने से लोग निश्चिंत रहते हैं और जब रोशनी जाने लगती है तब डाॅक्टर के यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं लेकिन तब तक देर हो गई होती है। चिकित्सकों की मानें तो ग्लूकोमा का पता विशेष जांच से ही चल सकता है इसलिए इसकी जांच में लापरवाही भारी पड़ सकती है क्योंकि एक बार ग्लूकोमा की शिकायत हो जाने पर यह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता। विश्व ग्लूकोमा सप्ताह (8 मार्च से 14 मार्च) पर जिले भर के सरकारी अस्पतालों में ग्लूकोमा के प्रति जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान रोगियों की आंखों की उचित देखभाल के बारे में जानकारी देने के साथ आंखों की देखभाल के टिप्स दिए जा रहा है। ग्लूकोमा में आंख की नस सुख जाती है और एक बार रौशनी चले जने के बाद पुन: वापस नहीं होती है। ग्लूकोमा आंख चोट लगनें एवं मोतियाविंद को समय से ऑपरेशन नहीं कराने एवं उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह के रोगियों को भी हो सकता है। काला मोतिया के समुचित एवं नियमित ईलाज से आगे होने वाली दृष्टिविहीनता को रोका जा सकता है। इस तरह के लक्षण होने पर तुरंत अपने नजदिकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या सदर अस्पताल में नेत्र चिकित्सक से उपचार करना चाहिए।