कोरोना इफेक्ट / चैत्र नवरात्र में दर्शन एवं पूजन पर रोक, 800 वर्षों में पहली बार... मां ताराचंडी के पट बंद

फाइल फोटो। फाइल फोटो।
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  • प्रधान पुजारी उदय गिरी एवं रामलायक गिरी ने बताया कि ताराचंडी मंदिर की स्थापना का इतिहास 12वीं शताब्दी का है
  • 51 शक्तिपीठों में से एक मां ताराचंडी मंदिर सासाराम से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर कैमूर पहाड़ी की गुफा में स्थित है

दैनिक भास्कर

Mar 25, 2020, 10:55 PM IST

सासाराम. कोरोना वायरस के कारण लगभग 800 वर्षों में पहली बार शक्तिपीठ मां ताराचंडी मंदिर के पट को बंद किया गया। जिसके कारण हजारों श्रद्धालु इस बार चैत्र नवरात्र में भी मां की दर्शन एवं पूजन करने से महरूम रह गए। प्रधान पुजारी उदय गिरी एवं रामलायक गिरी ने बताया कि ताराचंडी मंदिर की स्थापना का इतिहास 12वीं शताब्दी का है। तब से अब तक कभी भी मां का पट बंद नहीं हुआ। लेकिन इस महामारी को देखते हुए भक्तों की सुरक्षा के मद्देनजर मंदिर के पट को अनिश्चितकालीन के लिए बंद करना पड़ा। सिर्फ मां को भोग लगाने के लिए पुजारी द्वारा कुछ देर के लिए पट को खोला जाता है। 


51 शक्तिपीठों में से एक मां ताराचंडी मंदिर सासाराम से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर कैमूर पहाड़ी की गुफा में स्थित है। मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर इस मंदिर के पास पहाड़, झरने व अन्य जल स्त्रोत हैं। इस पीठ के बारे में किवदंती है कि सती के तीन नेत्रों में से श्री विष्णु के चक्र से खंडित होकर दायां नेत्र यहीं पर गिरा था, जो तारा शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर की प्राचीनता के बारे में कोई ठोस साक्ष्य लिखित रूप से नहीं है।

लेकिन मंदिर में स्थित शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि 11वीं सदी में भी यह देश के ख्यात शक्ति स्थलों में से एक था। सासाराम के ताराचंडी  धाम में 1169 ई. से पहले भी पूजा हुआ करती थी। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इस पीठ का नाम तारा रखा था। दरअसल यहीं पर परशुराम ने मां तारा की उपासना की थी। मां तारा इस शक्तिपीठ में बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं और यहीं पर चंड का वध कर चंडी कहलाई थी। इस धाम पर वर्ष भर में तीन बार मेला लगता है। जहां हजारों श्रद्धालु मां का दर्शन पूजन कर मन्नते मांगते हैं। यहां मन्नतें पूरा होने पर अखंड दीप जलाया जाता है। मंदिर के गर्भगृह के समीप संवत 1229 का खरवार वंशीय राजा प्रताप धवल देव द्वारा ब्राह्मी लिपि में लिखवाया गया शिलालेख भी है, जो मंदिर की ख्याति व प्राचीनता को दर्शाता है। 

1980 में जय मां ताराचंडी कमेटी के गठन के बाद से ही यहां पर शारदीय एवं चैती नवरात्र में मेला लगने की परंपरा चलती आ रही है। इसके अलावे श्रावण में भी एक माह तक श्रावणी मेला चलता है। 2011 से हर वर्ष चैत्र सप्तमी को मां ताराचंडी महोत्सव का आयोजन भी किया जाता रहा है। जिसमें भोजपुरी लोक जगत के एक से बढ़कर कलाकार अपने सुरों का जादू बिखेर चुके हैं। लेकिन कोरोना वायरस के कारण मेला से लेकर महोत्सव तक को स्थगित करना पड़ा। ऐसी मान्यता है कि अखंड दीप नवरात्रि में नौ दिन तक जलाने पर इच्छित मनोरथ पूर्ण होती है। ताराचंडी धाम कमिटी के महामंत्री महेंद्र साहू ने बताया कि यूपी-बिहार के कई जिलों के लोग आते हैं। इस बार रोक है।

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