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बिहार / तेजस्वी के लिए अंदर और बाहर 'अपनों' से निपटना बड़ी चुनौती, राजद ने घोषित किया है सीएम उम्मीदवार

राजद ने तेजस्वी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सीएम कैंडिडेट घोषित किया है। राजद ने तेजस्वी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सीएम कैंडिडेट घोषित किया है।
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राजद ने तेजस्वी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सीएम कैंडिडेट घोषित किया है।राजद ने तेजस्वी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सीएम कैंडिडेट घोषित किया है।

  • तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर महागठबंधन के बीच नहीं है सहमति
  • अगले साल नवंबर में बिहार में होना है विधानसभा चुनाव, नीतीश के चेहरे पर मैदान में उतरेगा एनडीए

दैनिक भास्कर

Dec 11, 2019, 05:00 PM IST

पटना (आशुतोष रंजन). बिहार में विधानसभा चुनाव में अब 10 महीने से भी कम का वक्त बचा है। एनडीए के अंदर तो नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ने की सहमति पहले ही बन चुकी है, लेकिन महागठबंधन का चेहरा कौन होगा, यह अब तक साफ नहीं है। ऐसे में राजद ने एकतरफा फैसला लेते हुए तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया। तेजस्वी के लिए विरोधियों के साथ साथ अपनों से भी निपटना बड़ी चुनौती है। तेजस्वी को अब यह सोचना है कि महागठबंधन को कैसे साथ लेकर चला जाए और अन्य दल भी उनके नाम पर सहमति जताएं।

तेजस्वी के नाम पर नहीं है सहमति
तेजस्वी को राजद की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के पहले ही कांग्रेस के नेता इस पर असहमति जता चुके हैं। हम के अध्यक्ष जीतन राम मांझी भी बोल चुके हैं तेजस्वी राजद के सीएम कैंडिडेट हैं, महागठबंधन के नहीं। हालांकि, लोकसभा चुनाव से पहले मांझी तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की लगातार वकालत करते थे। रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और वीआईपी अध्यक्ष मुकेश सहनी इस मामले में चुप्पी साधे हैं। रालोसपा और वीआईपी तेजस्वी को सीएम कैंडिडेट बनाने के सवाल पर कुछ भी बोलने से बचते रहे हैं।

लोकसभा चुनाव के बाद शुरू हुआ टकराव
राजनीतिक विश्लेषक शंभूनाथ सिन्हा कहते हैं 2019 लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद महागठबंधन का बिखराव साफ तौर पर दिखता है। दरअसल, लोकसभा चुनाव में अपने पिता लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में तेजस्वी ही महागठबंधन के नेता थे। बिहार में महागठबंधन को ज्यादा से ज्यादा सीट जीताने की जिम्मेदारी तेजस्वी के कंधों पर ही थी। लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। तेजस्वी ने सिर्फ अपनी ही नहीं, अपने सहयोगियों कांग्रेस, वीआईपी, रालोसपा और हम चारों दलों की लुटिया डुबो दी। महागठबंधन बिखरने की कगार पर आ गया। हम और रालोसपा ने समन्वय कमेटी बनाने की मांग की जिस पर राजद और कांग्रेस ने कोई ध्यान नहीं दिया।

एक मंच पर साथ आने से बचते रहे महागठबंधन के नेता
शंभूनाथ सिन्हा बताते हैं कि कई मौकों पर महागठबंधन के सभी दल एक साथ नहीं दिखे। पिछले दिनों जब रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा धरने पर बैठे थे तब कांग्रेस, हम और वीआईपी के नेता तो पहुंचे लेकिन तेजस्वी सिर्फ आखिरी दिन कोरम पूरा करने के लिए अनशन तुड़वाने पहुंचे। जीतन राम मांझी ने जब प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर धरना दिया तब उनके साथ कोई पार्टी नहीं दिखाई दी। चुनाव में हार के बाद महागठबंधन के सभी नेता सिर्फ राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर एक साथ मंच पर जुटे।

अक्टूबर में हुए उपचुनाव के दौरान सीट शेयरिंग को लेकर महागठबंधन के पार्टियों के बीच तल्खी सरेआम हो गई थी। राजद ने एकतरफा फैसला लेते हुए चार विधानसभा सीटों पर अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था, जबकि हम के अध्यक्ष जीतन राम मांझी और वीआईपी के मुकेश सहनी सीटों के बंटवारे पर अड़े थे। ऐसा लगा जैसे रालोसपा उपचुनाव के सीन से ही बाहर हो गई थी। दो सीट पर तो राजद के उम्मीदवार उतारने के बाद हम और वीआईपी ने अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया था।

परिवार के अंदर विवादों से निपटना तेजस्वी के लिए बड़ी चुनौती
तेजस्वी के लिए सभी को साथ लेकर चलना जितनी बड़ी चुनौती है उतनी ही पार्टी और परिवार के अंदर एकजुटता बनाए रखने की भी। तेजप्रताप और मीसा समय-समय पर पार्टी के लिए बड़ी मुसीबतें खड़ी करते रहे हैं। तेज प्रताप कब-कौन सा स्डैंड लेंगे, कोई नहीं जानता। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे के साथ उनकी तल्खी थी। राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि तेज प्रताप की वजह से राजद ने रामचंद्र पूर्वे को फिर से प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाने का फैसला किया। ऐसी चर्चा थी की पार्टी की कमान तेजस्वी के हाथों में सौंपी जा सकती है, लेकिन पार्टी में पारिवारिक विवाद हावी न हो जाए इसके लिए लालू को ही अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया गया।

लालू परिवार के अंदर चल रहे विवादों पर पार्टी के कई बड़े नेता नाराजगी भी जता चुके हैं। यही वजह है कि राजद उपाध्यक्ष रहे शिवानंद तिवारी ने उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। सीनियर लीडर रघुवंश प्रसाद सिंह भी इस पर नाराजगी जता चुके हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का साफ कहना है कि अगर राजद पारिवारिक विवाद में उल्झी रही तो आगे बढ़ पाना मुश्किल होगा।

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