पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर
डाउनलोड करें
पटना. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा है। उन्होंने लिखा कि- कांग्रेसी एजेंडे के तहत मोदी सरकार की अंधी आलोचना करता आपका आलेख पढ़ा। आलेख की कुछ पंक्तियों से मन को थोड़ा सुकून मिला लेकिन प्रोपगैंडे से भरी बाकी पंक्तियों को देख निराशा हाथ लगी। भारत की आत्मा को झकझोर कर रख देने वाले प्रपंचों और कुकृत्यों से आप आहत हैं, यह जान कर खुशी हुई। थोड़ी राहत मिली कि आपकी पारिवारिक पार्टी में अभी भी कुछ लोग हैं, जिनमें लोकतंत्र और सामाजिक मूल्यों की थोड़ी परवाह बची हुई है। नहीं तो जिस तरह सोनिया, राहुल और प्रियंका लोगों को एक झूठे मुद्दे पर सड़क पर उतर कर ‘आर या पार’ कर लेने की सलाह दे रहे थे, उससे लोग पूरी और पूरी कांग्रेस को दंगाइयों के साथ समझने लगे थे।
जायसवाल ने आगे लिखा कि आपने अपने आलेख में तीन मुद्दों को उठाया सामाजिक सौहार्द का विघटन, आर्थिक मंदी और वैश्विक स्वास्थ्य समस्या। आपके आलेख के मुताबिक इन मुद्दों ने आपके मन को भारी कर दिया और आप अपने भावोद्गार प्रकट करने को विवश हो गये। आपको यह जान कर हर्ष होगा कि पिछले छह वर्षों में सरकार द्वारा किये गये अथक प्रयासों से अर्थव्यवस्था के मामले में भारत ब्रिटेन और फ़्रांस जैसे देशों से भी आगे निकल चुका है। आज हम पांचवें स्थान पर काबिज हैं। इसके अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर आइएमएफ, ब्रुकिंग्स और वर्ल्ड बैंक आदि की रिपोर्टों पर आप अगर एक सरसरी निगाह भी डालेंगे तो आर्थिक मामलों पर उठ रही आपकी शंकाएं स्वत: शांत हो जाएंगी। इसके अतिरिक्त कोरोना वायरस पर सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम सबके सामने हैं, जिन्हें किसी के प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है।
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा- बहरहाल समाजिक सौहार्द पर जतायी आपकी चिंता सबसे वाजिब है, क्योंकि इससे सभी चीजें जुड़ी होती हैं। भाजपा का कार्यकर्ता होने के नाते इस मसले पर आपके मन में उठे प्रश्नों का जवाब देकर आपके बोझिल मन को थोड़ा हल्का करने का प्रयास करने के साथ-साथ कुछ खुद के प्रश्न भी आपके समक्ष रखना चाहूंगा, जिसके जवाब हिंदुस्तान के अधिकांश नागरिकों के मन के ‘भारीपन’ को हल्का करने में सहायता कर सकते हैं।
याद कीजिए कि आपके मन को भारी कर देने वाले इस सारे मामले की शुरुआत सीएए को लागू करने से हुई थी, जिसकी मांग आपने खुद 2003 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार से की थी। जो कानून आपकी खुद की निगाह में बिना देर किये लाना चाहिए था, उसे लागू करते ही आपकी पार्टी उसकी खिलाफत पर उतर आयी, लेकिन आप मौन रहे। आपके नेता झूठ पर झूठ बोलते रहे, लेकिन आपका मौन टूटा नहीं। काश! कि अगर आपने शुरुआत में ही एक बार भी अपने नेताओं को झूठ बोलने के लिए मना किया होता, उन्हें इसके दुष्परिणामों से आगाह किया होता तो आज कई माताओं की गोद सूनी न होती, कईयों के सर से बाप का साया न हटा होता। लोग अपनी औलादों को बिलखते न देख रहे होते। उनके जीवन का आसरा उनसे न छीना गया होता। आपको नहीं लगता कि इस समाजिक सौहार्द के विघटन में आपकी पार्टी, शीर्ष नेताओं के साथ-साथ कहीं न कहीं आपका मौन भी जिम्मेवार है! क्या एक परिवार के प्रति आपकी प्रतिबद्धिता आम जनता के जान-माल से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
आपने अपने आलेख में नागरिकता संशोधन कानून में बदलाव भी मांग की है जिसे देख काफी आश्चर्य हुआ। जिस कानून का कभी आप खुद समर्थन कर रहे थे, आज आप उसे बदलना चाहते हैं, वह भी बिना कारण बताए। क्या आपकी निगाह में पॉलीथीन की टेंट में जीवन घसीट रहे धार्मिक प्रताड़ितों का कोई मानवाधिकार नहीं! क्या उन्हें आपकी राजमाता की महत्वाकांक्षा और वोटबैंक की घृणित राजनीति की बलि चढ़ने के लिए छोड़ देना चाहिए? आश्चर्य लगा यह देख कर कि आप अब ऐसा सोचने लगे हैं।
Copyright © 2021-22 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.