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अंग्रेजों के विरोध के बाद भी बिकती रही बोरोलीन

6 महीने पहले
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1929 के कलकत्ता में गौर मोहन दत्ता ने जीडी फार्मास्युटिकल्स शुरू की थी। ये वो जमाना था जब भारत पर ब्रिटिश राज था। जब इस कंपनी की बनाई ‘बोरोलीन’ बाजार में आई तो ब्रिटिशर्स अचंभित थे। पुरजोर कोशिश हुई कि इस क्रीम का प्रोडक्शन बंद करवाया जाए लेकिन वो इस क्रीम को घर-घर तक पहुंचने से रोक नहीं सके। ये ही हाल आज लगभग 91 साल बाद भी है, घर-घर में ‘बोरोलीन’ पाई जाती है।

जब देश आजाद हुआ तो कंपनी ने अपनी सारी क्रीम लोगों में मुफ्त बांट दी थी। कहा तो यह भी जाता है कि इसकी लोकप्रियता की खबर जब जवाहरलाल नेहरू और एक्टर राजकुमार को हुई तो उन्होंने भी इसका उपयोग शुरू किया। ये वो दौर था जब प्रचार का ज्यादा जोर नहीं हुआ करता था, सिवाए अच्छे प्रोडक्ट को मिली तारीफ के अलावा कोई और जरिया ही नहीं होता था कि उसकी प्रसिद्धि घर-घर तक पहुंचाई जा सके।

आजादी के बाद स्किनकेअर प्रोडक्ट की जैसे बाढ़ सी आ गई थी लेकिन ‘बोरोलीन’ की जगह कोई नहीं ले पाया। इस सफलता का श्रेय जबरदस्त क्वालिटी, सुलभ पैकिंग के खाते में रहा। इस प्रोडक्ट को तो नकली प्रोडक्ट्स से भी लड़ाई नहीं करना पड़ी। कई कंपनियों ने ऐसी ही क्रीम बनाने की कोशिश भी की और थोड़े ही समय में वो खुद-ब-खुद खत्म हो गईं। कई साल तक कंपनी केवल एक प्रोडक्ट ‘बोरोलीन’ के सहारे ही रही। जीडी फार्मा ने 90 के दशक के आखिर में ‘एलीन हेअर ऑइल’ लॉन्च किया था जो केवल बंगाल को ही टारगेट करता था। 2003 में ‘सुथॉल’ नाम के एंटिसेप्टिक लिक्विड के लॉन्च से कंपनी ने दूसरी बड़ी सफलता हासिल कर ली थी। 2016 में इसी प्रोडक्ट ने कंपनी के रेवेन्यू में 30 फीसद यानी 150 करोड़ रुपए का योगदान दिया। आधे से ज्यादा रेवेन्यू अभी भी कंपनी को ‘बोरोलीन’ से मिलता है। ‘सुथॉल’ गर्मी के मौसम में कंपनी की सेल बढ़ा देता है और ‘बोरोलीन’ ठंड के मौसम में खूब बिकता है।

Á कहा जाता है कि इस कंपनी पर सरकारी खजाने का एक रुपया भी कभी उधार नहीं रहा।

Á कंपनी ने कभी भी ‘बोरोलीन’ बनाने के फॉर्मूले को राज नहीं रखा।


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