लोकसभा सीट बक्सर / 20 सालों से राजद और भाजपा के बीच होता रहा है कड़ा मुकाबला, 1984 के बाद नहीं जीत सकी है कांग्रेस

Dainik Bhaskar

May 12, 2019, 05:27 PM IST



Buxar Loksabha seat Main Fight between BJP and RJD candidate
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Buxar Loksabha seat Main Fight between BJP and RJD candidate

  • इस सीट से सबसे ज्यादा जीत का रिकॉर्ड लाल मुनि चौबे के नाम, 4 बार सांसद रहे
  • भाजपा प्रत्याशी अश्विनी चौबे और राजद उम्मीदवार जगदानंद सिंह के बीच मुख्य मुकाबला
  • भागलपुर सीट पर विवाद को लेकर 2014 में भाजपा ने अश्विनी चौबे को यहां से टिकट दिया था

बक्सर. गंगा के तट पर बसे बक्सर में राजद और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला होता है। 1984 के बाद इस सीट पर कांग्रेस एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर सकी। 1996 में पहली बार इस सीट पर भाजपा का खाता खुला। लाल मुनि चौबे सीपीआई प्रत्याशी तेज नारायण सिंह को हराकर संसद पहुंचे। 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अश्विनी चौबे को यहां से टिकट दिया और उन्होंने राजद उम्मीदवार जगदानंद सिंह को हराया।

 

एनडीए में इस बार हुए सीट शेयरिंग में यह सीट फिर से भाजपा के पास आई है और पार्टी ने एक बार फिर अश्विनी कुमार चौबे पर भरोसा जताया है। महागठबंधन की तरफ से राजद उम्मीदवार जगदीनंद सिंह मैदान में हैं।

 

आजादी के बाद 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में जहां देशभर में ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी वहीं बक्सर सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार और डुमरांव के महाराजा कमल सिंह कांग्रेस के कलावती को हराकर संसद पहुंचे थे। 1957 में भी कमल सिंह निर्दलीय लड़े और कांग्रेस के हरगोविंद मिश्रा को हराकर दोबारा दिल्ली पहुंचे। 1957 में हुए आम चुनाव में कमल सिंह कांग्रेस प्रत्याशी अनंत प्रसाद शर्मा से चुनाव हार गए थे।

 

अश्विनी कुमार चौबे, भाजपा प्रत्याशी
अश्विनी चौबे भागलपुर के रहने वाले और ब्रह्मण समाज से आते हैं। भागलपुर सीट पर विवाद के बाद बक्सर टिकट दिया गया था और मोदी लहर चुनाव जीत गए थे। इस बार भाजपा के टिकट पर दोबारा मैदान में हैं।

 

जगदानंद सिंह, राजद उम्मीदवार
राजपूत समाज से आने वाले जगदानंद सिंह 2009 में यहां से सांसद चुने गए थे। मोदी लहर में हार का सामना करना पड़ा था। इस बार फिर राजद ने टिकट दिया है।

 

भागलपुर सीट पर विवाद के बाद बक्सर से लड़े थे अश्विनी चौबे
केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे का गृह जिला भागलपुर है। वे यहीं से चुनाव लड़ना चाहते थे। 2014 में भागलपुर सीट से वर्तमान सांसद शाहनवाज हुसैन भी चुनाव लड़ने के लिए जोर आजमा रहे थे। पार्टी के अंदर डैमेज कंट्रोल की स्थिति न बने, इसलिए भाजपा ने अश्विनी चौबे को बक्सर से टिकट दिया। चौबे बक्सर से चुनाव जीत गए, लेकिन शाहनवाज भागलपुर सीट से चुनाव हार गए। इस बार एनडीए की सीट शेयरिंग में भागलपुर सीट जदयू के खाते में चली गई वहीं भाजपा ने अश्विनी चौबे को दोबारा बक्सर से मैदान में उतारा है।

 

इस सीट पर था लालमुनि चौबे का दबदबा, 4 बार सांसद रहे
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी रहे लाल मुनि चौबे बक्सर सीट से 4 बार सांसद चुने गए। 1996, 1998, 1999 और 2004 में वे यहां से चुनकर दिल्ली पहुंचे। 2009 लोकसभा चुनाव में वे राजद प्रत्याशी जगदानंद सिंह से महज 2 हजार वोट से चुनाव हार गए थे। 2014 में भाजपा की तरफ से टिकट कटने के बाद लाल मुनि चौबे ने राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया। 25 मार्च 2016 को उनका निधन हो गया।

 

ग्राउंड रिपोर्ट
वैसे तो बक्सर लोकसभा सीट से 15 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन की बीच है। चुनाव में स्थानीय मुद्दे गायब हैं और यहां एक ही फैक्टर है मोदी। मोदी 'हां' और मोदी 'ना' के बीच मतदाता कन्फ्यूज हैं। एक तरफ भाजपा प्रत्याशी अश्विनी कुमार चौबे प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर मैदान में हैं वहीं महागठबंधन उम्मीदवार जगदानंद सिंह एनडीए सरकार की नाकामियों और जातीय मुद्दों पर गोलबंदी की कोशिश में जुटे हैं। जनतांत्रिक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अनिल कुमार भी काफी सक्रिय हैं। रामगढ़, दिनारा, राजपुर और डुमरांव में उनकी अच्छी पकड़ है। वे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगे हैं।

 

स्थानीय मुद्दे
बिहार के दूसरे जिलों की तरह बक्सर में लोगों के बीच मुख्य मुद्दा है रोजगार सृजन। हर साल रोजगार की तलाश में सैकड़ों लोग पलायन करते हैं। खेती के अलावा रोजगार का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। किसानों का कहना है कि सरकार ने सिंचाई के लिए पानी और शुद्ध पेयजल का वादा किया था, लेकिन इस पर कोई काम नहीं हुआ। 

 

बक्सर स्टेशन को विश्वस्तरीय स्टेशन बनाने की घोषणा की गई थी, लेकिन 5 वर्षों में एक-दो ट्रेनों के ठहराव के अलावा कोई काम नहीं हुआ। चुनावी बिगुल बजने के चंद दिनों पहले आनन-फानन में बक्सर के इटाढ़ी रेलवे गुमटी पर आरओबी का शिलान्यास किया गया। जबकि अबतक रेलवे और राज्य सरकार के सड़क निर्माण विभाग ने अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं दिया है।

 

लोकसभा का चुनावी गणित
बक्सर को सवर्ण बाहुल्य सीट कहा जाता है और यहां ब्राह्मण वोटरों की अच्छी संख्या है। यहां राजपूत और यादव वोटरों का भी दबदबा है। यही वजह से है कि भाजपा और राजद यहां से ब्रम्हण या राजपूत को ही टिकट देती है। बक्सर सीट पर वोटरों की कुल संख्या 1,340,892 है। इसमें 608,357 महिला और 732,535 पुरुष वोटर हैं। 

 

बक्सर संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें आती हैं-ब्रह्मपुर, राजपुर, बक्सर, रामगढ़, डुमरांव और दिनारा। इसमें राजपुर सीट एससी के लिए आरक्षित है। 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 पर जदयू, एक-एक सीट पर राजद, कांग्रेस और भाजपा ने जीत दर्ज की थी।

 

बक्सर सीट एक नजर-

 

साल जीते हारे
1952(साहाबाद नॉर्थ वेस्ट) कमल सिंह(निर्दलीय) कलावटी(कांग्रेस)
1957 कमल सिंह(निर्दलीय) हरगोविंद मिश्रा(कांग्रेस)
1962 अनंत प्रसाद शर्मा(कांग्रेस)     कमल सिंह(निर्दलीय)
1967 आरपी सिंह(कांग्रेस) आर सिंह(समयुक्त सोशलिस्ट पार्टी)
1971 अनंत प्रसाद शर्मा(कांग्रेस)     राम सुभाग सिंह(एनसीओ)
1977 रामा नंद तिवारी(भारतीय लोक दल) अनंत प्रसाद शर्मा(कांग्रेस)
1980 कमला कांत तिवारी(कांग्रेस आई) सूरज प्रसाद(सीपीआई)
1984 कमला कांत तिवारी(कांग्रेस) तेज नारायण सिंह(सीपीआई)
1989 तेज नारायण सिंह(सीपीआई) कमल सिंह(भाजपा)
1991 तेज नारायण सिंह(सीपीआई) कमल सिंह(भाजपा)
1996 लाल मुनि चौबे(भाजपा) तेज नारायण सिंह(सीपीआई)
1998 लाल मुनि चौबे(भाजपा) उदय प्रताप सिंह(राजद)
1999 लाल मुनि चौबे(भाजपा) शिवानंद तिवारी(राजद)
2004 लाल मुनि चौबे(भाजपा) ददन सिंह(निर्दलीय)
2009 जगदानंद सिंह(राजद) लाल मुनि चौबे(भाजपा)
2014 अश्विनी चौबे(भाजपा) जगदानंद सिंह(राजद)

 

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