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करने करने

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Danik Bhaskar | Mar 06, 2018, 05:29 PM IST

रांची/पटना. चारा घोटाले से जुड़े दुमका कोषागार से अवैध निकासी मामले में सीबीआई स्पेशल जज शिवपाल सिंह की कोर्ट ने सात नए आरोपी बनाए हैं। इनके खिलाफ सम्मन जारी किया गया है। सभी को 28 मार्च को कोर्ट में पेश होने को कहा गया है।

जिन्हें आरोपी बनाया गया है, वे हैं- बिहार के मुख्य सचिव और दुमका के तत्कालीन डीसी अंजनी कुमार सिंह, बिहार के पूर्व डीजीपी डीपी ओझा, तत्कालीन वित्त सचिव विजय शंकर दूबे, सीबीआई के तत्कालीन इंस्पेक्टर और वर्तमान में एएसपी अजय कुमार झा और बिहार विधानसभा के तत्कालीन वरीय पदाधिकारी व पीएसी के सचिव फूल झा। इनके अलावा सप्लायर दीपेश चांडक और एक अन्य गवाह शिवकुमार पटवारी को भी आरोपी बनाया गया है। इनमें से डीपी ओझा लालू प्रसाद की ओर से पेश किए गए बचाव गवाह थे, जबकि अन्य छह सीबीआई के गवाह थे।

कोर्ट ने कहा- सीबीआई ने सही ढंग से जांच ही नहीं की, जिसे चाहा आरोपी बना दिया, जिसे चाहा गवाह

जज बोले-सीबीआई ने जिसे चाहा, उसे आरोपी बना दिया और जिसे चाहा उसे सरकारी गवाह। पावर का दुरुपयोग कर कई आरोपियों को सुरक्षा दी। वीएस दूबे और पूर्व डीजीपी डीपी ओझा रिटायर हो चुके हैं। इनके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति आदेश की जरूरत नहीं है। वहीं दुमका के तत्कालीन डीसी अंजनी कुमार सिंह और सीबीआई के तत्कालीन इंस्पेक्टर अजय कुमार झा अभी सरकारी सेवा में हैं। इसलिए इनके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की जरूरत है। कोर्ट ने सीबीआई के डीजी को इन दोनों के लिए एक महीने में अभियोजन स्वीकृति लेने को कहा है। कोर्ट ने अपने आदेश में क्या-क्या कहा पढ़िए हू-ब-हू...

अंजनी के दुमका में डीसी रहते 6 हजार के एलॉटमेंट लेटर पर 50 लाख की निकासी
अंजनी कुमार सिंह :
पद के हिसाब से ट्रेजरी ऑफिसर, डीसी हुआ। हालांकि, वह अपना यह अधिकार दूसरे अधिकारी को दिए रहता है, जो ट्रेजरी ऑफिसर कहलाता है। उसने पशुपालन विभाग के बिल को पास किया, जिसमें विभाग के बजट का बिल्कुल ख्याल नहीं किया गया।

देवघर के डीसी ने दुमका के डीसी को पत्र लिख एलॉटमेंट लेटर मांगा, जो क्षेत्रीय निदेशक (पशुपालन विभाग, दुमका) द्वारा रिसीव किया गया था। 6 जाली एलॉटमेंट लेटर का खुलासा हुआ। इससे 50 लाख देवघर ट्रेजरी से निकाले गए, जबकि बजट एलॉटमेंट सिर्फ 6 हजार का था। इसकी जांच एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट एस.एस.तिवारी ने की। जांच रिपोर्ट, देवघर के उपायुक्त को सौंपी।

देवघर के उपायुक्त ने दुमका के डीसी को इस बारे में पत्र लिखा। दुमका के तत्कालीन डीसी अंजनी सिंह ने इस बारे में बहुत दिनों तक कोई कार्रवाई नहीं की। दुमका कोषागार से रुपए निकलते रहे। डिप्टी कलेक्टर दुमका ब्रिज किशोर पाठक ने दुमका कोषागार की जांच की। पाया कि वित्तीय वर्ष 1995-96 में नन प्लान हेड में सिर्फ डेढ़ लाख रुपए आवंटित थे। जबकि सिर्फ दो महीनों-दिसंबर 1995 और जनवरी 1996 में क्षेत्रीय निदेशक निदेशक ने 3 करोड़ 76 लाख 38 हजार 853 रुपए निकाल लिए। अंजनी सिंह, जो 1992-93 में वित्त विभाग के अपर सचिव थे, जो बाद में दुमका के डीसी बने, 17 अगस्त 1993 को आदेश दिया कि 1 लाख से अधिक के बिल उनके सामने पेश किया जाए। उनके आदेश पर ही जिला कोषागार इसका भुगतान करेगा।

मुझे अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। नोटिस भी नहीं मिला है। हां, मैंने भी मीडिया में नोटिस वाली खबर देखी है। जब भी कोई नोटिस आएगा, उसका जवाब दिया जाएगा। कोर्ट के हर आदेश का पालन किया जाएगा। -अंजनी कुमार सिंह


दूबे के वित्त सचिव रहते जाली बिल से निकासी
वी.एस.दूबे : कोर्ट ने कहा कि दूबे ने अगस्त 1995 में वित्त सचिव का जिम्मा संभाला व जाली कागजातों पर दिसंबर 1995 व जनवरी 1996 में कोषागार से रुपए की निकासी हुई। सबूतों के आधार पर दूबे प्रथम दृष्टया आरोपी हैं।

मुझे नोटिस के बारे में कोई जानकारी नहीं है। आगे जैसा होगा, किया जाएगा। -विजय शंकर दूबे, पूर्व मुख्य सचिव (बिहार सरकार)

सीबीआई अफसर से मिल घोटालेबाजों को बचाया
डीपी ओझा :
कोर्ट ने डीजीपी (सेवानिवृत्त) डीपी ओझा को सीबीआई के तत्कालीन इंस्पेक्टर और मामले की जांच में शामिल अजय कुमार झा के साथ मिल कर आपराधिक षड्यंत्र का दोषी माना है। उन पर जानकारी के बावजूद आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई न करने का भी आरोप है। ओझा को कोर्ट के सामने पेश होने और केस यू/एस 120 बी, आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13-1 (सी,डी) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया गया है।

अजय कुमार झा: कोर्ट ने सीबीआई के तत्कालीन इंस्पेक्टर अजय कुमार झा पर गड़बड़ी की सूचना मिलने के बाद भी डीपी ओझा को हर तरह से बचाव करने का आरोपी माना है। झा पर मामले के अन्य आराेपियों के साथ सांठ-गांठ रखने और उन्हें हर तरह से बचाने और सहयोग करने का दोषी माना गया है। जांच को भटकाने का भी आरोप है।

फूल झा : पीएसी के आदेशों का उल्लंघन करने, जाली बिल पेश करने व दोषियों का बचाव करने का दोषी माना है। समिति ने 29 मई-8 जून 1993 तक पशुपालन विभाग में बजट आवंटन से अधिक खर्च पकड़ा। समिति ने झा को तमाम कागजातों को जब्त करने और समिति के सामने पेश करने का आदेश दिया। लेकिन झा ने ऐसा नहीं किया।

दीपेश चांडक : कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि अकाट्य सबूतों के बाद भी सीबीआई ने चांडक जैसे अपराधी पर लगे आरोपों की अनदेखी की। उसे सीबीआई ने उसे आंखों का तारा बना कर रखा और उसे बचाया गया। चांडक को यू/एस 120 बी, आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया है।

शिव कुमार पटवारी : आलू और प्याज का व्यापार करने वाले शिव पटवारी पर जिले में पदस्थापित पशुपालन विभाग के पदाधिकारियों से सांठगांठ कर वर्ष 1984 में सुअर, मुर्गी और जानवरों का चारा ढोने के नाम पर दो लाख का भुगतान लेने का आरोप है। उनपर लंबित बिल के भुगतान के लिए दुमका के क्षेत्रीय निदेशक शेष मुनि राम को 25 फीसदी राशि रिश्वत देने का आरोप है।