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इनके अधीन

इनके अधीन

Vivek Kumar | Last Modified - Jan 02, 2018, 05:49 PM IST

पटना. बिहार का चारा घोटाला दो अफसरों के बीच किसी फंड के 30% हिस्से पर कब्जा जमाने में हुई अनबन के बाद सामने आया था। यह अनबन चाईबासा में तैनात डीएचओ (जिला पशुपालन अधिकारी) और रांची के डोरंडा में तैनात पशुपालन निदेशालय के एक अफसर के बीच हुई थी। 1984 में ही छोटे स्तर पर चारा घोटाले की शुरुआत हो चुकी थी। वेटरनरी इलाके से जुड़े नेताओं को भी इसकी भनक मिल गई थी और अपनी जरूरत के हिसाब से वो बड़े अफसर सिन्हा जी (श्याम बिहारी सिन्हा नहीं) से महीना-दर-महीना पैसा वसूलने लगे थे।

घोटाले के पैसे के लिए शुरू हुआ था विवाद

- चारा घोटाला में दवा सप्लाई करने वाले एक दूसरे दर्जे के सप्लायर के मुताबिक, श्याम बिहारी सिन्हा के बीमार पड़ जाने और उनकी ताकत कम होती देख चाईबासा में तैनात डीएचओ (जिला पशुपालन अधिकारी) और रांची के डोरंडा में तैनात पशुपालन निदेशालय के एक अफसर में चारा घोटाला के पैसे के बंटवारे को लेकर अनबन शुरू हो गई।
- कोलकाता, रांची, दिल्ली और पटना में बैठे पहले दर्जे के चार बड़े सप्लायरों ने विवाद सुलझाने की कोशिश भी की, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। आखिरकार, तब करीब 12 साल से चल रहा चारा घोटाला सामने आ ही गया।

नेताओं को मिलता था 30 फीसदी हिस्सा
- इसी बीच, पटना के एक बड़े सप्लायर के पोते के अपहरण और उसको खोजने के लिए हाईलेवल पर हुई पहल के कारण मामला काफी हद तक सार्वजनिक हो गया।
- दरअसल, एक मशहूर वेटरनरी डाॅक्टर ने अफसरों और नेताओं के समीकरण में इतना घालमेल कर दिया था कि उजागर होने से पहले ही चारा घोटाले से राजनीति और महकमे से जुड़े लोग काफी हद तक परिचित हो चुके थे।

- यह चर्चा आम हो गई थी कि घोटाले की राशि के अधिकांश हिस्से को वह अपने पास रखता था और 30 फीसदी पैसा ही नेताओं को पहुंचाता था।
- पटना के एक बड़े सप्लायर द्वारा अपने राजनीतिक आका को गिफ्ट देने के लिए पटना म्यूजियम के सामने खास महाल की जमीन पर बनवाया व्हाइट हाउस भी चर्चा में था।

‘पैसा ले के चुप हो जाओ वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा’
- विधानसभा में चारा घोटाला का सवाल उठाने पर निर्दलीय विधायक दिलीप वर्मा को धमकी मिली थी।
- जनवरी 1996 में चारा घोटाला उजागर हुआ था, पर उससे तीन साल पहले 1993 में ही दिलीप वर्मा ने विधानसभा में इस मामले को उठाने की कोशिश की थी। इसके बाद उन्हें कई स्तरों पर धमकी मिलने लगी थी।
- तब बाहुबली विधायक पप्पू यादव ने दिलीप वर्मा से कहा था- भइया, इस मामले को छोड़ दीजिए।
- यह वाकया दिलीप वर्मा ने भास्कर को बताया। कहा-हमने पप्पू के कहने के बावजूग विधानसभा में एक साल बाद दोबारा ध्यानाकर्षण सूचना लाई तो 16 मार्च 1994 को उसे स्वीकृत करना पड़ा। पर बजट सत्र में सदन में बहस नहीं कराने पर मानसून सत्र में मजबूर होकर विधानसभा में गेट पर धरना देना पड़ा।
- धरने पर बैठते ही सीएम लालू प्रसाद और विपक्ष के नेता जगन्नाथ मिश्रा ने आकर कहा कि दिलीप जी ये क्या कर रहे हैं? इसके पहले ध्यानाकर्षण सूचना स्वीकार करते ही फोन पर धमकियां मिलने लगी थीं। कहा जाने लगा- पैसे ले के चुप हो जाओ, वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा।

वकील भी समझाने लगे थे- वो लोग खतरनाक हैं, फेरे में पड़ जाइएगा
- विधानसभा में मामला दबाने की कोशिश को देखते हुए चारा घोटाला को उजागर करने पर अड़े दिलीप वर्मा घोटाला से जुड़ी फाइलों को लेकर वकील के पास पहुंचे।
- वर्मा ने बताया कि एक बड़े वकील ने समझाया था कि क्यों ऐसे मामलों में पड़ रहे हैं। वो खतरनाक लोग हैं। नाहक फेरे में पड़ जाइएगा। लेकिन चारा घोटाला से जुड़े मामलों की उच्चस्तरीय जांच की अनुशंसा करने वाले तब के मंत्री रामजीवन सिंह के कागजात को लेकर दिलीप वर्मा लगातार दौड़ते रहे।
- अंतत: उन्होंने तब के एक जाने-माने वकील के पुत्र और अपने साढ़ू भाई से संपर्क साधा। इससे पहले कि वो मामले को अदालत में ले जाते, उनका निधन हो गया। मामला कोर्ट में जाने से रह गया।

1996 में दर्ज चारा घोटाले के खास पड़ाव

- 27 जनवरी 1996 को पहला मामला चाईबासा थाने में 04/96 दर्ज किया गया।
- 11मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए।
- 19 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज 41 मामलों को अपने अधीन लेकर जांच शुरू की।
- कांड संख्या आरसी 20(ए)/96 स्पेशल जज एके लाल की अदालत में सीबीआई ने लालू प्रसाद सहित 56 आरोपियों के खिलाफ 23 जून 1997 को भादवि की धारा 120 बी, 409, 420, 467, 468, 477ए और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13(2) 13(1)(डी) के तहत चार्जशीट दायर।
- 23 जुलाई 1997 को कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ संज्ञान पारित किया।
- 24 जुलाई 1997 और 31 अक्टूबर 1997 को सभी आरोपी कोर्ट के समक्ष हाजिर हुए।
- कोर्ट ने पांच अप्रैल 2000 को आरोपियों के खिलाफ चार्ज फ्रेम किया।
- राज्य गठन के बाद यह मामला रांची स्थानांतरित कर दिया गया।
- पूर्व सीएम लालू प्रसाद का बयान 14 फरवरी 2012 को कोर्ट में दर्ज किया गया।
- लालू प्रसाद की ओर से बिहार के पूर्व डीजीपी डीपी ओझा सहित 20 गवाहों ने गवाही दी थी।

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