छेड़खानी के डर से वर्षों से बेटियां नहीं जाती थीं स्कूल, जहांआरा ने बदल डाला गांव

3 वर्ष पहले
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पश्चिमी चंपारण के बगहा 2 प्रखंड के लक्ष्मीपुर ढोलबजवा गांव की तस्वीर 2016 से बदलनी शुरू हुई। यह बदलाव लाया है पंचायत चुनाव जीतीं जहांआरा खातून ने। राज्य सरकार ने जब पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत का आरक्षण दिया जो गांवों में बदलाव की बयार बहनी शुरू हुई। पर्दा प्रथा तोड़कर जब जहांआरा खातून ने घर से कदम बाहर रखा तो घर के साथ-साथ पूरे समुदाय ने विरोध किया। जहांआरा महिला सशक्तीकरण की वो परिभाषा है जिन्होंने अपने अधिकारों को पहचान कर दूसरी लड़कियों को भी सशक्त करने की ठानी है। हाल ही में पटना एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं जहांआरा खातून ने उन चुनौतियों को साझा किया जिनसे लड़कर उन्होंने अपनी उड़ान भरने के लिए संघर्षशील महिलाओं और लड़कियों की राहों में उम्मीद की किरणें रौशन कीं।

मुस्कुराते हुए जहांआरा बताती हैं कि चुनाव जीतने के बाद जब वह घर से पहली बार निकलीं तो पति ने कहा हमारे जाति में बुर्खे के बिना महिलाएं नहीं निकल सकतीं तो मैंने अपने पति को जवाब दिया बुर्खे में ही सही लेकिन मैं निकलूंगी जरूर। उन्होंने अपने पति से संकल्पित शब्दों में दृढ़ होकर कहा, मेरे ऊपर अब गांव की जिम्मेदारी है। गरीबी की वजह से नाममात्र की पढ़ाई कर पाने के बावजूद उन्होंने ठाना कि कम पढ़ा लिखा होने को अपनी कमजोरी नहीं बनने देंगी। वह पढ़ाई का महत्व समझती थीं इसलिए उन्होंने छेड़खानी और कई सामाजिक प्रतिबंधों की वजह से घरों तक सीमित अपने गांव की 200 से ज्यादा लड़कियों को दो वर्षों में स्कूल पहुंचाया। सिर्फ स्कूल ही नहीं चंदा इकट्ठा कर कई लड़कियों को पढ़ने के लिए बाहर भेजा और आज वो लड़कियां सरकारी नौकरियां भी कर रही हैं। उस समय छेड़खानी एक गंभीर समस्या थी और लड़कियों ने डर से पढ़ाई छोड़ दी थी। उस डर को खत्म कर जहांआरा ने लड़कियों में वो आत्मविश्वास जगाया और उन्हें शिक्षित किया।

घर के पर्दा प्रथा को तोड़कर 2016 में पंचायत चुनाव जीती जहांआरा खातून ने 200 से ज्यादा लड़कियों को पहुंचाया स्कूल

चुनाव जीता तो हर तरह से उन्हें रोकने की कोशिश की गई और हमले भी हुए
जहांआरा बताती हैं कि जब उन्होंने चुनाव जीता तो हर तरह से उन्हें रोकने की कोशिश की गई और उनपर हमले भी हुए। वह बताती हैं कि चूंकि वो एक महिला थीं इसलिए लोग उनकी बात मानने को तैयार नहीं थे। जहांआरा जिस पंचायत में रहती हैं वहां आदिवासी परिवार ज्यादा रहते हैं। मुस्लिम परिवार गिने चुने दो से चार ही हैं। अपना अनुभव बांटती हुईं जहांआरा कहती हैं मेरे समुदाय ने कभी मेरा साथ नहीं दिया लेकिन आदिवासी बहनें हमेशा मदद के लिए आगे रहीं। आदिवासी बहनों की मदद और अपने आत्मबल की परिणाम है कि जहांआरा ने शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की ठानी। सबसे पहले अपने वार्ड में चल रहे राजकीय प्राथमिक विद्यालय में सात शिक्षकों को बहाली करवाई। स्कूल में शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था कराई और अपने स्कूल को मॉडल स्कूल की तर्ज पर तैयार किया। आज जहांआरा सुबह के 6 बजे से शाम के 6 बजे तक गांव के स्कूल और अन्य व्यवस्थाओं को सुधारने में लगी रहती हैं। वह बताती हैं कि शिक्षा ही हर मायने में लड़कियों को सशक्त कर सकती है। इसीलिए मैंने ठानी है कि अपने गांव की सभी लड़कियों को शिक्षित करूंगी।

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