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पुण्यतिथि पर याद किए गए भगवान बिरसा मुंडा

एक वर्ष पहले
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बिहार आदिवासी विकास परिषद द्वारा रविवार को आशीष लाॅज पंच मंदिरा, सीवान में धरती अबा भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि मनाई गई। इसकी अध्यक्षता प्रदेश महासचिव सतेन्द्र साह गोंड ने किया। इस मौके पर बिहार राज्य गोंड महासभा के जिला अध्यक्ष बालकुवंर साह ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 1870 के दशक में छोटानागपुर में मुंडा परिवार में हुआ था । यह एक जनजातीय समूह था जो छोटानागपुर पठार में निवास करते थे । बिरसा भगवान को 1895 में आदिवासी लोगों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 2 साल की सजा हो गई और अंत में 1900 में हैजे के कारण उनकी मौत हो गई।

लोगों को किया जागरूक

सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड प्रदेश में रांची के उलीहातू गांव में हुआ था। साल्गा गांव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढने आये। इनका मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। उन्होंने मुंडा लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिये अपना नेतृत्व प्रदान किया। 1894 में मानसून के छोटानागपुर में असफल होने के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की। मंगल कुमार साह ने कहा कि मुंडा विद्रोह का नेतृत्‍व एक अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग धरती बाबा के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी। 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला था। इस मौके पर शंभुनाथ प्रसाद गोंड, अमित कुमार गोंड, आशीष कुमार, आशी आदि मौजूद थे।

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