बड़हरिया में खिचड़ी भोज के साथ स्वास्थ्य शिविर का आयोजन

Patna News - एक माह की ट्रेनिंग के बाद डोमा बुलबुल ने ऐसा चला दांव कि चित हो गई तोखी, ईनाम में मिले रुपए और साइकिल गुठनी में...

Jan 16, 2020, 07:35 AM IST
Guthni News - health camp organized with khichdi banquet in badhariya
एक माह की ट्रेनिंग के बाद डोमा बुलबुल ने ऐसा चला दांव कि चित हो गई तोखी, ईनाम में मिले रुपए और साइकिल

गुठनी में मकरसंक्रांति के मौके पर अनोखा दंगल देखने को मिला। ये दंगल इंसानों के बीच नहीं बल्की बुलबुल पक्षी के बीच हुआ। वर्षों से मकर संक्रांति के मौके पर गुठनी के पूर्व प्रमुख अवधेश प्रसाद गुप्ता के हाता में बुलबुल के बीच दंगल प्रतियोगिता होता है। इसे देखने के लिए गुठनी प्रखंड के दर्जनों गांवों से सैंकड़ों लोग पहुंचते हैं। बुधवार को विशाल बुलबुल दंगल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस दंगल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए गुठनी निवासी आफताब आलम, अमर कसेरा, राजू अंसारी, चुन्नू अंसारी आदि ने अपने-अपने पक्षियों को लेकर शामिल हुए। दंगल देखने के लिए काफी संख्या में लोगों की भीड़ पहुंची। बतादें कि बुलबुल के बीच इस दंगल के लिए कई महीनों से तैयारी की जाती है। इसके लिए मेहनत और धन दोनों खर्च होते हैं। दिलचस्प बात ये है कि प्रतियोगिता में विजयी पक्षियों के मालिक को इनाम मिलता है। वहीं हारे हुए बुलबुलों को बंधन से रिहा कर दिया जाता है। इस दंगल प्रतियोगिता के फाइनल विजेता डोमा बुलबुल के मालिक गुठनी निवासी चुन्नू अंसारी, जिन्हें आयोजकों द्वारा एक साइकिल तथा 2500 का पुरस्कार मिला। उसने आफताब के तोखी को हराया।

दंगल
जंगल से लाकर दिया गया था कुश्ती का प्रशिक्षण, मुकाबला होने के बाद ग्रामीणों ने बुलबुलों को आजाद कर दिया

गुठनी में हुई बुलबुलो की कुश्ती देखने के लिए पहुंचे लोग।

बड़हरिया में यमुनागढ़ में लगे स्वास्थ्य जांच शिविर में उमड़ी भीड़।

बुलबुल दंगल का धार्मिक महत्व

मकर संक्रांति पर बुलबुलों की लड़ाई केवल मनोरंजन मात्र नहीं है। हिन्दू धर्म में ‘बुलबुल दंगल’ का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस लड़ाई की शुरुआत भगवान विष्णु के समय हुई थी। हिन्दू धर्म के अनुसार विष्णु परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। बुलबुल की लड़ाई सदियों पुरानी प्रथा है और भगवान विष्णु की पूजा बुलबुल की लड़ाई से शुरू होती है।

तोखी होती है सबसे लड़ाकू प्रजाति

बुलबुल के मालिक के अनुसार बाजार में कई प्रजातियों के बुलबुल बिकते हैं, जिसमें तोखी, डोमा, बेर्रा मुख्य प्रजातियां खास हैं।

लड़ाई के लिए किया जाता है तैयार

मकर संक्रांति (खिचड़ी) के दिन होने वाले बुलबुल दंगल के लिए विशेष तैयारी की जाती है। दंगल के लिए एक महीने पहले लड़ाई के लिए जंगल से पकड़कर या बहेलियों से खरीदकर बुलबुल लाया जाता है और उन्हें मैदान में उतारने से पहले इनको खिला-पिलाकर मजबूत बनाया जाता है। बुलबुल को लड़ाने वाले इसे काफी पौष्टिक खाना खिलाते हैं। लड़ाई के मैदान में अपने पठ्ठे की जीत को सुनिश्चित करने के लिए एक महीने पहले से इनका खूब ख्याल रखा जाता है।

कैसे होती है बुलबुल की लड़ाई की तैयारी

मकर संक्रांति के दिन होने वाले विशेष दंगल से पहले बुलबुल पहलवानों की कड़ी परीक्षा होती है। इसके लिए इन लड़ाके बुलबुलों को छोटे-छोटे दंगल से होकर इम्तिहान पास करना पड़ता है। बुलबुल मालिक आफताब आलम, चुन्नू अंसारी, अमर कसेरा, राजू अंसारी आदि का कहना है कि फाइनल दंगल में जीतने वाले बुलबुल को विशेष इनाम से सम्मानित किया जाता है। इस दौरान इन लड़ाके बुलबुलों के साथ कोई ज्यादती नहीं की जाती है। दंगल के बाद इन पठ्ठों को वापस जंगल में उड़ा दिया जाता है।

वर्षों से चली आ रही परंपरा निभाने के लिए विशेष रूप से की जाती हैै तैयारी

दरौंदा में देर शाम तक पतंगबाजी का चला दौर

दरौंदा| तिलकुट की मिठास और पतंगबाजी के साथ दरौंदा प्रखंड के सभी गांवों में मकर संक्रांति का त्योहार उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह में मौसम के अपेक्षाकृत साफ था। लोगों ने समीपवर्ती नदी व तालाब के साथ अपने घरों में स्नान किया। देवालयों में पूजा-अर्चना की गई। मंदिर में श्रद्धालु महिलाओं की भीड़ ज्यादा जुटी। प्रखंड मुख्यालय सहित पीपरा, रामाछपरा, बगौरा, दवन -छपरा, भीख़ाबांंध, जलालपुर, हड़सर, धनौती, धानाडीह, हाथोपुर समेत कई गांवों के मंदिरों में श्रद्धालुओं ने पूजा की। स्नान के बाद लोगों ने तिल दान किया। मकर संक्रांति के अवसर पर तिल दान का विशेष महत्व हैं, इससे स्वास्थ्य और आरोग्य वृद्धि होती हैं। मकर संक्रांति के अवसर पर कई श्रद्धालुओं ने अपने आवास पर बुलाकर ईस्ट मित्रों, ब्राह्मणों और बंधु - बांधवों को दही चूड़ा का भोज कराया। जदयू नेता वीरेंद्र शर्मा ने अपने आवास पर परिजनों, बंधुजनों और ब्राह्मणों को दही चूड़ा का भोज कराया और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं दीं‌। दिन खुशगवार होने के कारण बच्चों और युवाओं ने पतंगबाजी का खूब लुत्फ उठाया। हल्की हल्की हवा चल रही थी। आकाश में विभिन्न रंगों और डिजाइन की पतंगों बच्चों ने उड़ाई. दिन भर गांवों में ये काटा, वो काटा, कटी रे कटी की आवाज गूंजती रही. युवा और बच्चे काफी खुश थे। मकर संक्रांति को लोक व्यवहार में खिचड़ी का भी त्यौहार कहा जाता हैं इसलिए प्रायः सभी घरों में दोपहर बाद सुगंधित खिचड़ी घर की महिलाओं ने बनाई। सुबह में दही चूड़ा और तिलकुट के बाद सुपाच्य और स्वादिष्ट खिचड़ी लोगों ने खाई।

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