मकर संक्रांति पर बहुत याद आती है मां के हाथ की लाई

Patna News - पर्व पर परदेसी को घर की याद आती ही है। होली हो, दिवाली हो या फिर मकर संक्रांति। घर पर बने पकवान और व्यंजन का स्वाद...

Jan 16, 2020, 08:51 AM IST
Patna News - i miss my mother39s hand a lot on makar sankranti
पर्व पर परदेसी को घर की याद आती ही है। होली हो, दिवाली हो या फिर मकर संक्रांति। घर पर बने पकवान और व्यंजन का स्वाद मीठी यादों की पगडंडियों से आकर दस्तक देने लगता है। हाल के कुछ वर्षों में पर्व और त्योहारों की पुरानी परंपराओं का चेहरा बदला है। डिजिटल और ऑनलाइन दुनिया ने रिश्तों के बारीक मनोविज्ञान में अपनी घुसपैठ की है। इसकी अपनी सहजता और जटिलताएं हैं। अब लाई और काले तिल के लड्‌डू घर में बनने के बजाय ऑनलाइन और शहर के बाजारों से आ रहे हैं। ऐसे ही कुछ परंपराओं और घर की मीठी यादों के बारे में बताया सिने जगत के सितारों ने।

मोटे चावल को भूनकर बनी लाई याद आती है

वो गांव और आंगन की धूप यहां नहीं। हमें याद है सुबह कड़ाके की ठंड के बीच मां हमें स्नान करवा देती थी, हमें चूड़ा और लाई के साथ तिलकुट खाने को मिलता था। पंकज बताते हैं, मेरे यहां गोपालगंज में मोटा चावल होता था जिसे भुनकर गुड़ के पाक में उसकी लाई बांधी जाती थी। रात में मां के साथ वो भी लाई बांधा करते थे। उस लाई का स्वाद ही निराला था वो यहां नहीं मिलती है। सर्द रात में गरमागरम खिचड़ी खाने का आनंद ही कुछ और था। साथ में दही, पापड़, घी अंचार के रहने से स्वाद और भी निराला हो जाता था। पतंग उड़ाते थे, पर उन्होंने कहा, हमारे गांव में पतंगबाजी की परंपरा नहीं है।

पंकज त्रिपाठी, एक्टर

गंगा में नहा कर आते और तिल की लाई खाते

तुमसे रिश्ता तोड़ रही है, खबर है पटना वालों।।

15 साल पहले इस शे'र को लिखने और दिल न दिया, दिल न लिया तो बोलो न बोलो क्या किया जैसे चर्चित गीत के गीतकार विजय अकेला कहते हैं, मकर संक्रांति पर पटना बहुत याद आता है। अपार्टमेंट कल्चर ने आंगन छीन लिया और विकास की दौड़ ने गंगा को दूर कर दिया। उन दिनों हम सुबह गंगा में डुबकियां लगा आते और मां के हाथ की बनी हुई तिल, चूड़ा और मूढ़ी की लाई खाते। चूड़ा-दही और स्वादिष्ट सब्जियों का स्वाद लेकर दोस्तों के साथ घूमने निकल जाते। यहां मुंबई में हम संक्रांति पर कैफी आजमी के जानकी कुटीर के प्रांगण में उनकी जयंती मनाते हैं।

विजय अकेला,गीतकार

हम गमछी में लाई बांध खेलने निकल जाते थे

अनार कली ऑफ आरा और रन अवे लुगाई सहित कई फिल्मों के असिस्टेंट डायरेक्टर जितेन्द्र नाथ जीतू बताते हैं, उन्हें दरभंगा जिला के मनीगाछी की याद याती है, यह उनके नानी का गांव है। हमारे यहां गोला लाई बनाने की परंपरा रही है। नानी सुबह नहाने के बाद हाथ में तिल-चावल देकर कहती थी- बोलो तिल बहोगे न, मतलब जब अंत समय आएगा तो उस यात्रा में दो लकड़ी तो डालोगे। जीतू बताते हैं, रात में मां-मौसी हमें भी लाई का गोला बनाने को देती थी। सुबह नहाने के बाद हम गमछी में मूढ़ी और लाई बांध कबड्‌डी खेलने निकल जाते थे। वो बताते हैं मुंबई में एक बार केला के पत्ते पर मकर संक्रांति पर गांव की तरह भोज किया था, जो यादगार रहा।

जितेन्द्र नाथ जीतू फिल्म निर्देशक

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