जैसे बिना मेडिकल स्टडी सर्जन नहीं बन सकते, वैसे ही थिएटर बिन एक्टर नहीं

Patna News - सन् 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट ने वर्ल्ड थिएटर डे की शुरुआत की थी। तब से इसे 27 मार्च को पूरे विश्व में...

Mar 27, 2020, 08:01 AM IST
Patna News - just like you cannot become a surgeon without a medical study there is no theater without an actor
सन् 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट ने वर्ल्ड थिएटर डे की शुरुआत की थी। तब से इसे 27 मार्च को पूरे विश्व में मनाया जाता है। इस 59वें वर्ल्ड थिएटर डे पर जानिए थिएटर से फिल्मों में आए कुछ स्टार्स ने अपने थिएटर एक्सपीरियंस पर क्या कहा..

थिएटर ने मुझे अपने दम पर फैसले लेना सिखाया: ऋचा चड्ढा

मेरा पहला प्ले मेरे जूनियर स्कूल में था। तब मैं 10 साल की थी और मैंने यंग मदर टेरेसा का रोल प्ले किया था। मुझे कई लोगों के लिखे हुए प्ले पसंद जैसे विजय तेंदुलकर ने ‘सखाराम भायंकर’ लिखा था और शर्मिला के क्लासिक प्ले जैसे ‘स्ट्रीटकार नेम्ड डिजायर’ मुझे बहुत पसंद है। रंगमंच में अपने आप में एक कला है। इसे फिल्मों में कदम रखने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आज अभिनेताओं के लिए संभव है कि वे सिर्फ थिएटर करके भी सरवाइव कर सकते हैं। 20 साल पहले तक ऐसा नहीं था। रंगमंच ने मुझे सिखाया है कि मुझे अपने दम पर कैसे फैसले लेने चाहिए। एक टीम में अच्छा काम कैसे करना है और इसने मुझे अनुशासन सिखाया है। मुझे अपने गुरू बैरी जॉन के साथ काम करने के दिनों की बहुत याद आती है।’

थिएटर और सिनेमा मैं साथ में नहीं कर सकता: अली फज़ल

मेरा सबसे पहला प्ले विलियम शेक्सपियर का नाटक ‘द टेम्पेस्ट’ था। उसमें मेरे किरदार का नाम ट्रिंकलो था। उसे मैंने अपने स्कूल ‘द दून स्कूल’ के ऐनुअल प्रोडक्शन में परफॉर्म किया था। मेरा सबसे पसंदीदा प्ले जो मैंने देखा था वो ‘वुमन इन ब्लैक’ था। इसे मैंने कमानी थिएटर में देखा था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि एक नाटक आपको इतना भयभीत कर सकता है। दूसरा जिसे लगभग सभी नाटक प्रेमियांे ने देखा ही होगा वो है ‘हैमिल्टन’। मेरा पसंदीदा प्ले जिसका हिस्सा मैं खुद रहा हूं वो है ‘अ गाय थिंग’। मैं आज भी इस प्ले में परफॉर्म करने के लिए तैयार हूं। जब मैंने थिएटर करना शुरू किया था तब मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि मैं एक फिल्म अभिनेता बनूंगा। जब सिनेमा ने दस्तक दिया तो मैं बहुत भयभीत हो गया था क्योंकि मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं था। दोनों साथ काम कर मैं विश्वासघाती नहीं बनना चाहता था।’

फिल्मों में धाक जमाने से पहले पंकज त्रिपाठी स्टेज पर प्ले ही किया करते थे। इस दौरान पटना में उनके द्वारा किए गए एक नाटक का दृश्य।

थिएटर से बढ़िया और कोई परफाॅर्मिंग आर्ट नहीं: पंकज त्रिपाठी

मेरा पहला नाटक ‘लीला नन्दलाल की’ था। उस प्ले के लेखक थे भीष्म साहनी और निर्देशक थे विजय कुमार। इसमें मेरे किरदार का कोई नाम नहीं था। इस नाटक में मैंने चोर और सिपाही दोनों का किरदार निभाया था। वैसे मेरा पसंदीदा नाटक कालिदास का ‘आषाढ़ का एक दिन’ है। उस नाटक का किरदार विलोम मुझे बहुत पसंद है। एक एक्टर बनने के लिए थिएटर करना बहुत ज़रूरी है। जैसे बिना ट्रेनिंग और पढ़ाई के कोई आर्किटेक्ट और न्यूरो सर्जन नहीं बन सकते। वैसे ही एक्टिंग के लिए ट्रेनिंग बहुत ज़रूरी है और एक परफाॅर्मिंग एक्टर के लिए परफाॅर्मिंग आर्ट में थिएटर से बढ़िया कोई आर्ट नहीं है। थिएटर सिर्फ अच्छा एक्टर ही नहीं अच्छा इंसान भी बनाता है। इमोशंस की समझ थिएटर करते और देखते हुए ही आती है।’

my first stage performance

थिएटर से फिल्मों में आए कुछ स्टार्स ने वर्ल्ड थिएटर डे पर बताए अपने अनुभव

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