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कबीरा खड़ा बाजार में, पाखंड पर किया प्रहार

कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर... कबीर के इस दोहे और संगीतमयी धुन के बीच मंगलवार...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 04:57 AM IST
कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर... कबीर के इस दोहे और संगीतमयी धुन के बीच मंगलवार को प्रेमचंद रंगशाला में ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ नाटक की शुरुआत हुई। सामाजिक व्यवस्था में भेदभाव, धर्म में बढ़ते पाखंड का विरोध करने वाले संत कबीर के जीवन पर आधारित भीष्म साहनी के नाटक का निर्देशन तनवीर अख्तर ने किया। नाटक की कहानी शुरू होती है काशी के एक गांव से जहां के एक जुलाहे नूरा (सुनील किशोर) को एक बच्चा नदी में बह कर आता हुआ मिलता है।

वह उसे घर ले आता है।

इसके बाद नूरा और उसकी प|ी नीमा (नूतन तनवीर ) उसका पालन-पोषण करते हैं। वह बच्चा वहीं बड़ा होता है और आगे चल कर कबीर (सूरज पांडेय) बन जाता है। कबीर के दोहों व संगीतमयी धुन के बीच बताया गया कि मां की जिद पर जब कबीर लोई (सुष्मिता रानी) को विवाह कर घर लाए तो पता चला कि उनकी झोपड़ी जला दी गई है। इस पर कबीर ने अपनी प|ी को बताया कि गरीब के घर तो खुशियां घर की झोपड़ी को जलाकर भी मनाई जाती है। नाटक ने संदेश दिया कि गरीबी अपने आप में अभिशाप नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज की कुरीतियां ही जिम्मेदार हैं। इप्टा के बैनर तले मंचित इस नाटक के कलाकारों ने सशक्त अभिनय किया।

किलकारी के बच्चे इंटरनेशनल नाट्य उत्सव में दिखेंगे

पटना| किलकारी बाल भवन में बच्चों की ओर से मंचित नाटक ‘तोतो चान’ का चयन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली की ओर से आयोजित बच्चों का अंतरराष्ट्रीय नाट्य उत्सव ‘जश्ने बचपन’ के लिए किया गया है। ‘जश्ने बचपन’ में किलकारी के बच्चे ‘तोतो चान’ नाटक का मंचन 23 नवंबर को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली में करेंगे। ‘तोतो चान’ की कहानी तोत्सुको कुरोयानागी की है, जिसका हिन्दी अनुवाद पूर्वा याज्ञनिक कुशवाहा ने किया है। कॉन्सेप्ट, डिजाइन और सहायक निर्देशन रविभूषण कुमार का है। निर्देशन विनोद राई ने किया है और प्रस्तुति किलकारी के बच्चों ने दी है। इस नाटक में तोतो चान एक चंचल और हाजिर जवाबी बच्ची है। तोतो कल्पनाशील होती है, इस कारण उसके पास हजारों सवाल होते हैं। उन सवालों के कारण तोतो से स्कूल के टीचर परेशान रहते हैं, जिसके कारण उसे कई स्कूलों से निकाल दिया जाता है। अंत में तोतो के माता-पिता तोतो का नाम तोमोए स्कूल में कराते हैं, जो रेल के डिब्बे में चलता है। कोवायाशी वहां के प्राचार्य होते हैं। उन्हें तोतो चान की चंचलता और सवाल पूछने का तरीका काफी पसंद आता है। वह तोतो चान को अपने स्कूल में रख लेते हैं और यहां से शुरू होती है तोतो की पढ़ाई। कोवायाशी बच्चों के विचारों का सम्मान तो करते ही हैं।