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50 हजार नाटकाें का साक्षी है कालिदास रंगालय का पर्दा

2 वर्ष पहले
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ये जो धूल दिख रही है कालिदास रंगालय के पर्दे पर, यह हजारों कलाकारों की मेहनत की धूल है। वो कलाकार जो सामाजिक सांस्कृतिक चेतना की धरती पर थाप देते रहे और एक गूंज के साथ धूल उड़ती रही। यही नहीं कालिदास रंगालय के इस पर्दे में झाल-मंजीरा और ढोलक की थाप भी आप सुन सकते हैं। यह पर्दा, पर्दा नहीं मां के आंचल की तरह कलाकारों की पीड़ा-दर्द, बेबसी और खुशी भी छिपाए है। जो रंगकर्मी सफलता की सीढ़ियां चढ़ गए उनकी मुस्कान और जो किसी कारण ठहर गए उनका दर्द। पिछले 37 साल से यह पर्दा कलाकारों की कला के प्रति साधना और समर्पण का साक्षी रहा है।

1971 में जमीन मिलने के बाद ओपन थियेटर बना, 1982में ढांचा बनकर हुआ तैयार और 83 में लगाए गए पर्दे

पहले खुले में हाेता था नाटक, सबसे पहले अनिल कुमार मुखर्जी लिखित ‘पहल’ का मंचन

बिहार अार्ट थियेटर के ज्वायंट सेक्रेटरी प्रदीप गांगुली बताते हैं कि राजधानी में नाटकाें काे मुकम्मल जगह देने के लिए एक पहल की गई। 1971 में जमीन मिलने के बाद नाटक के लिए बनने वाले हाॅल का नाम मांगा गया। हमने दाे नाम, गांधी विहार और कालिदास रंगालय भेजा जिसमें यह नाम तय हुअा। कालिदास रंगालय में 1974 में अाेपन स्पेस में अनिल कुमार मुखर्जी लिखित पहले नाटक पहल का मंचन हुअा। उसके बाद मंचन का सिलसिला चला जिसमें श्रीरामचचंद्र एक अच्छे आदमी की खोज में, बकरी, बिदेसिया, माटी जारी जैसे नाटक को उन दिनों दर्शकों ने खूब एंज्वाय किया।

उस वक्त सभी पर्दों पर आई थी 45 हजार की लागत

प्रदीप गांगुली ने बताया कि 1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने दाे लाख दस हजार रुपए की ग्रांट दी जिससे इसका ढांचा बना। 1983 में 45 हजार रुपए की लागत से मेन कर्टन, सेकेंड कर्टन,बैकड्राॅप कर्टन, साइक्लाेरमा यानी ह्वाइट कर्टन, साइड विंग्स, अपर स्काई और फ्रंट झालर लगाए गए। अभी िसर्फ मेन कार्टन लगाने में 70 से 80 हजार रुपए लगेंगे। कालिदास का यह पर्दा लगभग 50 हजार नाटकाें के मंचन का साक्षी रहा है।

कालिदास के नाटक के पात्र यहां हैं जीवंत

कालिदास के नाटक के पात्र से आप रोज रंगालय में रूबरू हो सकते हैं। रंगालय के मुख्य हॉल का नाम है शकुंतला प्रेक्षागृह, शकुंतला की सखी प्रियंवदा के नाम पर एक हॉल है, अनुसुय्या सभागार में रंगकर्मियों का क्लासरूम है जहां वो रंगकर्म सीखते हैं। कैंटीन का नाम रखा गया है अन्नपूर्णा। यहां जी प्लस फोर गेस्ट हाउस भी बनना था जो नहीं बन पाया। इसमें नाट‌्य महोत्सव के समय देश के दूसरे राज्यों से आने वाले कलाकारों के रहने और खाने की सुविधा की जानी थी।

फाइल फोटो के बैक में है वर्षों पुराना पर्दा

1983 से 90 तक पटना में थे 85 थियेटर ग्रुप

गांगुली बताते हैं 1983 से 1988 तक राजधानी में सांस्कृतिक चेतना का अाकाश व्यापक रहा, 85 थियेटर ग्रुप हर दिन नाटक करते थे। सामाजिक और राजनीतिक विषयाें पर रंगकर्मियाें की मुखर अावाज से जनचेतना सकारात्मक अाकार लेती रही। फिर 1988-89 के बाद सरकार की अाेर से ग्रांट लगभग खत्म हाे गया। इसका नतीजा हुअा कि 85 थियेटर ग्रुप की संख्या घटकर 15 से 20 रह गई। 2007 से 2015 तक सेंट्रल ग्रांट और इंडिविजुअल ग्रांट मिलने के कारण स्थिति सुधरी है। अभी राजधानी में 40 से 45 ग्रुप हैं जिनमें 35 कालिदास रंगालय में ही नाटक करते हैं।

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