लोकसभा सीट काराकाट / अपनी सीट बचाना उपेंद्र कुशवाहा के लिए चुनौती, महाबली दे रहे कड़ी टक्कर

Dainik Bhaskar

May 17, 2019, 07:57 PM IST



महागठबंधन प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा और एनडीए उम्मीदवार महाबली सिंह। महागठबंधन प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा और एनडीए उम्मीदवार महाबली सिंह।
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महागठबंधन प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा और एनडीए उम्मीदवार महाबली सिंह।महागठबंधन प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा और एनडीए उम्मीदवार महाबली सिंह।

  • 2009 में नए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया काराकाट, दो बार हुए चुनाव में एनडीए को मिली जीत
  • मोदी लहर में चुनाव जीतने वाले उपेंद्र कुशवाहा इस बार महागठबंधन में

काराकाट. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच चुनाव जीतने वाले उपेंद्र कुशवाहा के लिए इस बार अपनी सीट बचा पाना बड़ी चुनौती है। जदयू उम्मीदवार महाबली सिंह से उन्हें कड़ी टक्कर मिल रही है। पिछली बार कुशवाहा के साथ भाजपा और लोजपा कार्यकर्ताओं समर्थन था और उन्होंने राजद प्रत्याशी कांति सिंह को हराया था। 2009 में नए परिसीमन के बाद काराकाट सीट अस्तित्व में आया और अब तक हुए दो चुनावों में एनडीए का दबदबा रहा है। 2009 में जदयू उम्मीदवार महाबली सिंह ने जीत दर्ज की थी।

 

उपेन्द्र कुशवाहा, रालोसपा प्रत्याशी
उपेन्द्र कुशवाहा 2014 के मोदी लहर में एक लाख से अधिक मतों से जीते थे। इस बार वे महागठबंधन के साथ है। इससे जातीय समीकरण भी पलट गया है। दोबारा यहां से जीत के लिए अपनी ताकत झोंके हुए हैं।

 

महाबली सिंह, जदयू उम्मीदवार
महाबली सिंह 2009 में एनडीए से ही जदयू के टिकट पर लगभग 20 हजार वोट से जीते थे। 2014 के चुनाव में भी जदयू के टिकट पर लड़े परन्तु उन्हें महज 76 हजार वोटों से संतोष करना पड़ा था।

 

2 सीटों से चुनाव लड़ रहे कुशवाहा
उपेंद्र कुशवाहा इस बार दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। पहला काराकाट और दूसरा उजियारपुर। दो सीटों से चुनाव लड़ने पर एनडीए नेताओं का कहना है कि हार के डर से उन्होंने खुद के लिए दो सीटों से मैदान में उतरने का फैसला किया है। अगर उन्हें काराकाट में जीत का भरोसा है तो उजियारपुर से चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है। जदयू का दावा है कि कुशवाहा को दोनों सीटों पर मुंह की खानी पड़ेगी। एनडीए नेताओं के बयान पर कुशवाहा ने कहा कि भाजपा और जदयू ने उन्हें धोखा दिया है। दो सीटों पर चुनाव लड़ने की वजह है भाजपा और जदयू दोनों को हराना। उजियारपुर में वे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं।

 

नीतीश के लिए भी नाक का सवाल बना काराकाट
काराकाट की प्रतिष्ठाजनक सीट पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विशेष नजर है। यह सीट नीतीश के लिए नाक का सवाल बन गया है। कई प्रमुख लोगों से वे सीधे मोबाइल पर बात कर सहयोग और समर्थन मांग रहे हैं। दरअसल, नीतीश और कुशवाहा की दुश्मनी पुरानी है। जदयू के एनडीए में शामिल होने के बाद से कुशवाहा लगातार नीतीश पर हमलावर थे। नीतीश के एनडीए में शामिल होने से कुशवाहा असहज महसूस कर रहे थे और यही वजह है कि न चाहते हुए भी उन्हें एनडीए छोड़ना पड़ा। कुशवाहा को मजबूरी में महागठबंधन का दामन थामना पड़ा था।

 

ग्राउंड रिपोर्ट
पिछले दो बार के चुनावों में एनडीए ने इस सीट पर कब्जा जमाया और अब हैट्रिक के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के धुर विरोधी उपेन्द्र कुशवाहा की महागठबंधन प्रत्याशी के रूप में मौजूदगी ने सीट को हाईप्रोफाइल बना दिया है। यहां लड़ाई सीधे तौर पर एनडीए और महागठबंधन के बीच सिमटती जा रही है। दोनों ही प्रत्याशियों के लिए अपने-अपने कुनबे के वोटरों को अपने पाले में बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।

 

समीकरण 1

 

बालू के कारण भी बंटे हैं वोटर 
उपेन्द्र कुशवाहा के लिए परंपरागत वोटरों को एकजुट करना चुनौती है। डिहरी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा से यादव उम्मीदवार इंजीनियर सत्यनारायण सिंह की मौजूदगी और राजद की कांति सिंह का टिकट कटने से इस जाति के वोटरों की नाराजगी दूर करने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। मल्लाह वोटर भी बड़ा फैक्टर हैं। सोन में बालू उत्खनन को लेकर मल्लाह और यादवों के बीच जंग जगजाहिर है। ऐसे में अपने कुनबे के वोटरों को एकजुट करना महागठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

 

समीकरण 2 

 

सवर्ण वोट में सेंध की कोशिश 
राजपूत वोटरों की संख्या दो लाख से अधिक है। इनका झुकाव एनडीए की ओर है। सपा के घनश्याम तिवारी और बसपा के राजनारायण तिवारी अन्य सवर्ण वोटों में सेंधमारी की कोशिश में हैं। भूमिहार वोटरों की नाराजगी का फायदा भी ये प्रत्याशी उठाने की कोशिश में हैं। कुशवाहा, मल्लाह और दलित वोटरों में सेंधमारी भी एनडीए के लिए चुनौती है। ये जितने एनडीए के पक्ष में होंगे, राह भी उतनी आसान होगी। वैसे सवर्ण, वैश्य, कुर्मी और महादलित वोटरों के बड़े वर्ग का आसरा एनडीए को है।

 

स्थानीय मुद्दे गौण, राष्ट्रवाद और जातीय मुद्दों पर जोर
इस चुनाव में प्रमुख स्थानीय मुद्दे यथा डालमियानगर उद्योग समूह, सोन नदी में अवैध बालू उत्खनन, प्रमुख सिंचाई और सड़क की परियोजनाओं का मुद्दा गौण हो गया है। राष्ट्रीय मुद्दों में सर्जिकल स्ट्राईक, राष्ट्रवाद और आतंकवाद की चर्चा है। स्थानीय मुद्दों की जगह जातीय समीकरण ने ले ली।

 

लोकसभा का चुनावी गणित
काराकाट संसदीय क्षेत्र में सवर्ण और यादव वोटरों का दबदबा है। मुस्लिम और कुशवाहा वोटर्स यहां गेमचेंजर साबित हो सकते हैं। यहां सवर्ण करीब 20%, यादव-16%, मुस्लिम-11% और कुशवाहा वोटरों की आबादी 8 प्रतिशत है।

 

काराकाट में मल्लाहों और यादवों की प्रतिद्वन्द्विता ने महागठबंधन की चिंता बढ़ा दी है। यदि परंपरागत वोटर दोनों के पक्ष में एकजुट भी रहे तो स्वजातीय वोटरों के साथ-साथ दलित-महादलित वोटर ही निर्णायक होंगे। महादलितों का एक बड़ा वर्ग बसपा के साथ जा सकता है। इस वोट पर महागठबंधन भी भरोसा जता रहा है। इस सीट पर वोटरों की कुल संख्या 17,59,358 है। इसमें 927,862 महिला और 891,432 पुरुष वोटर हैं।

 

काराकाट सीट एक नजर-

 

साल जीते हारे
2009 महाबली सिंह(जदयू)  कांति सिंह(राजद)
2014 उपेंद्र कुशवाहा(रालोसपा) कांति सिंह(राजद)
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