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उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय के बिना बाबा साहेब का सपना अधूरा

इ स 14 अप्रैल को बाबा साहेब अपने 127 वें जन्मदिन के कुछ दिन पहले ही आरक्षण विरोधी भारत बंद के विफल होने से भारतीय...

Danik Bhaskar

Apr 17, 2018, 02:10 AM IST
इ स 14 अप्रैल को बाबा साहेब अपने 127 वें जन्मदिन के कुछ दिन पहले ही आरक्षण विरोधी भारत बंद के विफल होने से भारतीय राजनीति में अपने विचारों की बढ़ रही स्वीकार्यता से जहां कुछ संतोष की सांस लेते, वहीं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हाल में हुए सरकार के निर्णयों से परेशान हो कर अपना सर पकड़ लेते। सामाजिक सशक्तीकरण की उनकी परिकल्पना शिक्षा और राजनीतिक-प्रशासनिक प्रतिनिधित्व पर आधारित है, परन्तु जिस तरह के निर्णयों की घोषणा केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से की गई है, उससे इन दोनों आधारों पर ही कुठाराघात हुआ है। बिहार के एक दर्जन विश्वविद्यालयों में सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों का कुलसचिव के रूप में नियुक्ति अकादमिक दृष्टि से बहस का मुद्दा तो है ही, पर अगर हम यहां बाबा साहेब के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के प्रतिनिधित्व का अभाव खटकता है।

प्रो राजेश के. झा, दिल्ली विवि

दलित-पिछड़े छात्रों को नुकसान

आज भारतीय समाज में बाबा साहेब के विचार के प्रसार के पीछे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण की अहम भूमिका रही है, लेकिन बढ़ते हुए निजीकरण से तो इसी को खतरा है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने जो यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की श्रेणीबद्ध स्वायत्तता की घोषणा की है, वह निजीकरण की योजना का ही हिस्सा है। इस के तहत शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रमों को खुद ही कमाई करके चलाना पड़ेगा, जिससे छात्रों की फीस लाखों में हो जाएगी। इससे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आने वाले छात्रों के लिए स्वायत्तता प्राप्त पटना वीमेंस कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के दरवाजे बंद हो जाएंगे। केंद्रीय बजट में निजी विश्वविद्यालयों की सहायता के लिए हजारों करोड़ों की राशि मुहैया करवाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इनमें दलित-पिछड़े छात्रों की उपस्थिति ना के बराबर है।

बिहार में भी कम होंगे मौके

यूजीसी के 5 मार्च, 2018 के रोस्टर पर अधिसूचना से दलित-पिछड़ों के अकादमिक प्रतिनिधत्व को लेकर गंभीर संकट मंडरा रहा है। यूजीसी ने 2006 में कॉलेज-विवि को इकाई मानकर 200-पॉइंट आरक्षण रोस्टर प्रोफेसर, एसो. प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए लागू करने का निर्णय लिया। इससे फैकल्टी में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ी, पर इस निर्णय से तो उल्टा हो जाएगा। 5 मार्च की अधिसूचना विभाग को इकाई मानकर रोस्टर बनाने का प्रावधान करता है। अभी दो केंद्रीय विवि ने 117 फैकल्टी पदों का विज्ञापन दिया, जिसमें अजा-अजता के लिए कोई पद आरक्षित नहीं है, पिछड़े वर्ग के लिए सिर्फ 3 पद आरक्षित हैं। बिहार भी इससे अछूता नहीं रह पाएगा, जहां हजारों पद दशकों से भरे नहीं गए। जैसे ही विभागों के पर रोस्टर बनेगा, आरक्षित पदों में भारी कमी होगी। हाल के दशकों में बिहार में जो समता आधारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया सबल हुई है, उस पर ऐसे निर्णयों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। (लेखक दिल्ली विवि की कार्यकारी परिषद के सदस्य भी हैं)

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