आदमी काे आदमी बनाती हैं पुस्तकें देती हैं नई समझ और विश्व-दृष्टि

Patna News - किताबों का अपना ही संसार है। क्या तुम इसमें जाना नहीं चाहोगे जो इनमें है, पाना नहीं चाहोगे? किताबें कुछ तो...

Nov 11, 2019, 09:31 AM IST
किताबों का अपना ही संसार है।

क्या तुम इसमें जाना नहीं चाहोगे

जो इनमें है, पाना नहीं चाहोगे?

किताबें कुछ तो कहना चाहती हैं,

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!

- सफ़दर हाशमी

ये सफ़दर हाशमी नहीं, विरह में तड़पती हुई किताबें बोल रही है आपसे, हमसब से, बुला रही हैं अपने पास इस वचन के साथ कि वो हमेशा रहेंगी आपके पास एक वफ़ादार दोस्त और पथप्रदर्शक की तरह। पुस्तकें हमारे सामने पूरा आकाश खोल देती हैं। सभ्यताओं के विकास को समझने का मौका देती हैं। पटना में दो-दो पुस्तक मेले लगे हैं। ऐसा भी नहीं है कि बिहारियों में पुस्तक प्रेम की कोई कमी रही है। “हंस” के सम्पादक राजेंद्र यादव ने कहा था कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का सबसे बड़ा बाज़ार बिहार रहा है। साहित्य सृजन और साहित्य पठन से हमारा गहरा नाता रहा है। वहीं बिहार का युवा वर्ग यूपीएससी की परीक्षाओं में अध्ययन और मेहनत के बल पर अपना लोहा मनवाता रहा है। इन युवाओं ने साबित किया है कि सफलता की कुंजी पुस्तकों में है। और यह हमारी विरासत भी रही है।

परंतु आज के इस यथार्थ से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि कक्षाओं से टेक्स्ट्बुक लगभग ग़ायब हो चुकी है और उसका स्थान गेस पेपर, पासपोर्ट तथा गूगल नोट्स ने ले लिया है। युवाओं का ध्यान मूलतः प्रतियोगिता परीक्षा की पुस्तकों तक सीमित है। पुस्तक पढ़ने की आदत शिक्षकों में भी घट रही है। फ़्रैन्सिस बैकन ने सत्य ही कहा था “रीडिंग मेक्स अ फ़ुल मैन”। दुनिया में प्रायः हर बुद्धिजीवी व्यक्ति के निर्माण में पुस्तकों का अमूल्य योगदान रहा है। यदि एक शिक्षक अपने छात्र में सही पुस्तक पढ़ने की आदत पैदा कर दे, तो वो छात्र आगे का रास्ता स्वयं भी तय कर सकता है। “स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते” अर्थात राजा केवल अपने देश में पूजा जाता है परंतु विद्वान सर्वत्र पूजे जाते हैं।

पुस्तकें हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है-‘तमसो मां ज्योतिर्गमय’। पुस्तकें हमें ज्ञान देती हैं और उस ज्ञान को जीवन की परिस्थितियों में सही तरह से लागू करने का गुर भी सिखाती है। किताबें हमारी संस्कृति, स्मृति, परंपराओं, विचारों, संदर्भो एवं अपने समय के सच का वाहक हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उसे आगे ले जाने का काम करती हैं। पुस्तक एक ऐसी दवा है जो पैलीयटिव (दर्द निवारक) है, क्यूरेटिव (रोगनाशक) है और प्रिवेंटिव (रोग रोधक) भी है। किताबें सॉफ़्ट फॉर्म जैसे ई-बुक या प्रिंट हो या फिर ऑडीओ अर्थात वाचिक हो, सब ज्ञान और प्रेरणा का भण्डार हैं। किताबें हमें देश-दुनिया, अतीत, वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं से परिचित कराती हैं। इसके अतिरिक्त भी पुस्तकों के कई लाभ है। पुस्तक पढ़ने से शब्दकोश तथा भाषा समृद्ध होती है, याददाश्त बढ़ती है, तनाव ख़त्म होता है। क्वीन विक्टोरिया ने कहा था “नेक्स्ट टू बाइबल, इन मेमाेरियम” (टेनिसन की शोक गीत) इज द सोलास ऑफ़ माई हार्ट।” साथ ही इससे एकाग्रता बढ़ती है। रात में पुस्तक पढ़ने से नींद अच्छी आती है। पुस्तकें हमारे घर की शोभा भी है। आज ऑनलाइन मार्केटिंग के युग में हर पुस्तक हर जगह उपलब्ध है। जब कुत्ता स्टेटस सिम्बल हो सकता है तो किताबें क्यों नहीं? मुझे याद है बहुत पहले मेरे गांव में एक पुलिस चौकी स्थापित की गयी थी। उसका दारोग़ा मुस्लिम था। उनका क़ुरान घर पर छूट गया था। वो क़ुरान के लिए पूरा मुस्लिम टोला घूम गए पर उन्हें क़ुरान नहीं मिला। अंत में मेरे पिताजी ने उन्हें क़ुरान दिया जिसकी उन्हें अपेक्षा नहीं थी। मैंने देखा कि उनके मन में मेरे पिताजी के प्रति सम्मान का भाव काफी बढ़ गया।

प्रो. राम भगवान सिंह 22 वर्षों से सरस्वती चतुर्थी अभियान चला रहे हैं। उनकी सोच है कि जिस तरह धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परम्परा है, उसी तरह वसंत पंचमी के एक दिन पूर्व लोग पुस्तकें खरीदें। पुस्तकें सचमुच आदमी को आदमी बनाती हैं।

छोटे लाल खत्री

पटना में पुस्तकों के मेले लगे हैं। पुस्तक किसी भी व्यक्ति के विकास में, समाज, सभ्यता के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नई दृष्टि देती है।

सबसे बेहतरीन दाेस्त हैं किताबें

पुस्तकाें की दुनिया में खाे जाने का सुख मानव का परिष्कार करता है। उसे विचार, कल्पना तथा जीवन लक्ष्य के प्रति सजग करता है। इस किताबी दुनिया का सीधा संबंध मानव विकास से जुड़ा है। लाखाें वर्षाें के क्रमिक विकास के बाद मानव ने भाषा का विकास का विकास किया। लिपियां बनाईं, फिर किताबें आईं। आज ताे कराेड़ाेें पुस्तकें प्रकाशित हाे चुकी हैं। चिकित्सा, कानून, राजनीति, इतिहास, दर्शन, अर्थशास्त्र सभी विषयाें पर किताबें हैं, पर साहित्य की अन्यान्य विधाओं का आनंद विशिष्ट है। हम रूस के टाॅल्सटाॅय, पुश्किन, चेखव, गाेर्की, चीन के कन्फ्यूशियस, लाओत्से, लु शुन, फ्रांस के फ्लावेयर, जाेला, बाल्जाक, स्पेन के सरगन्तीन और चिली के नेरूदा की किताबाें में खाे जाते हैं। मारक्वेज के जादुई यथार्थ में गाेते लगाते हैं।

हमारा ब्रिटेन के साथ औपनिवेशिक संबंध व्यथा की कथा है, पर शेक्सपीयर, जाॅयस, लारेंस, हार्डी के विचार मिले हैं, ताे साथ ही इलियट की कविता और आलाेचना भी मिली है। इसी प्रकार ग्रीस के प्लेटाे, अरस्तू के विचार हमें आंदाेलित करते हैं। अनुवाद की प्रकिया ने हमें सांस्कृतिक स्तर पर पुस्तकें देकर विश्व दृष्टि का निर्माण किया है। इस विश्व-दृष्टि और सतत प्रगतिशील समाज के निर्माण में पुस्तकाें की भूमिका अहम रही है, तभी ताे इतिहास लेखन में उन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया है। अत्यंत प्रचीनकालीन मिस्र में पेपिरस के ऊपर लिखा गया, मेसाेपाेटामिया में मिट्टी के टेबलेट पर कीलाक्षराें का प्रयाेग हुआ, चीन में काष्ठ और बांस का प्रयाेग मुद्रण के लिए किया गया। भारत में भाेजपत्र तथा तालपत्र पर लिखा गया। मानव ने लिखने के लिए पशुओं के चमड़े का भी प्रयाेग किया। आज किताबाें काे सर्वसाधारण काे उपलब्ध कराने में जर्मनी के गुटेनबर्ग का महत्वपूर्ण याेगदान रहा है। उन्हाेंने मुद्रण के लिए एक मशीन का निर्माण किया, जाे पांच साै वर्षाें तक आदर्श रहा है। उसमें परिवर्तन हाेता रहा है और आज के इंटरनेट की दुनिया में मुद्रण और प्रकाशन के नए तरीके ने पुस्तकाें की व्यापकता बढ़ा दी है।

आज ताे विचार संग्राम पुस्तकाें के बल पर हाे रहे हैं। टेमपेस्ट में राज्य से अधिक पुस्तकाें से प्यार की बात शेक्सपीयर ने की है। भारत काे जानने के लिए उसके साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। संस्कृत, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, हिंदी और उत्तर भारत की भाषाओं की पुस्तकाें का अध्ययन आवश्यक है। अच्छे अनुवाद उपलब्ध हैं। पढ़ना ही जानना है और सकारात्मक साेच वाली पीढ़ी के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि हम बच्चाें के जन्मदिन पर उनकी आयु के हिसाब से उपहार में पुस्तकें अवश्य दें।

शैलेश्वर सती प्रसाद

रितेश

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