लोकसभा सीट नालंदा / मोदी लहर में भी नीतीश के किले में नहीं लगी थी सेंध, इस बार भी महागठबंधन की राह मुश्किल



Nalanda Loksabha seat Main Fight between JDU and HAM candidate
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Nalanda Loksabha seat Main Fight between JDU and HAM candidate

  • इस सीट से 35 उम्मीदवार मैदान में, एनडीए और महागठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला
  • मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नाडिस भी नालंदा सीट से तीन बार सांसद बने
  • नालंदा में है नीतीश का दबदबा, 23 सालों से इस सीट पर एनडीए का है कब्जा

Dainik Bhaskar

May 12, 2019, 04:32 PM IST

नालंदा. नालंदा विश्वविद्यालय की वजह से प्रसिद्ध इस सीट पर 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में पूरे देश में मोदी लहर के बावजूद भाजपा नीतीश के गढ़ में सेंध नहीं लगा सकी थी। पिछली बार हुई सीट शेयरिंग में नालंदा सीट लोजपा के पास आई थी और पार्टी ने यहां से सत्यनंद शर्मा को टिकट दिया था। जदयू प्रत्याशी कौशलेंद्र कुमार ने उन्हें करीब 10 हजार वोटों से हराया था। पिछली बार जदयू ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा था, इस बार साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। एनडीए में हुई सीट शेयरिंग के बाद यह सीट जदयू के पास आई है और पार्टी ने कौशलेंद्र कुमार पर फिर भरोसा जताया है। वहीं महागठबंधन की तरफ से हम प्रत्याशी अशोक कुमार आजाद मैदान में हैं। इस सीट पर 19 मई को मतदान होना है।

 

कौशलेंद्र कुमार, जदयू प्रत्याशी
कुर्मी समाज से आते हैं और दो बार नालंदा सीट से सांसद रह चुके हैं। मोदी लहर के बावजूद अपनी सीट बचाने में सफल रहे थे। जॉर्ज फर्नाडिस के सांसद प्रतिनिधि रहे हैं। इस बार नालंदा से तीसरी बार मैदान में हैं।

 

अशोक कुमार आजाद, हम उम्मीदवार
अशोक कुमार अतिपिछड़ी जाति के हैं और गया के रहने वाले हैं। राजनीतिक बैकग्राउंड से हैं और पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।

 

सीपीआई का भी रहा है दबदबा
नालंदा संसदीय क्षेत्र में वामपंथियों का भी दबदबा है। इस सीट से तीन बार सीपीआई ने जीत दर्ज की है और 5 बार दूसरे नंबर पर रही। 1980, 1984 और 1991 में विजय कुमार यादव इस सीट से चुने गए। 1977, 1989 और 1996 में विजय को हार का भी सामना करना पड़ा था।

 

ग्राउंड रिपोर्ट
वैसे तो इस सीट से 35 प्रत्याशियों ने पर्चा भरा है, लेकिन एनडीए और महागठबंधन के बीच ही सीधा मुकाबला है। बाकी पार्टियां यहां सिर्फ वोट कटर के रूप में दिख रही हैं। नालंदा लोकसभा क्षेत्र में नीतीश का दबदबा है और यही वजह है कि जदयू पिछली बार भी यह सीट बचाने में कामयाब हो गई थी। इस बार जदयू और भाजपा के साथ आने से महागठबंधन की राह थोड़ी मुश्किल नजर आ रही है। चुनाव में एमवाय समीकरण के छिटकने की संभावना कम है। यही महागठबंधन के लिए राहत की बात है। दोनो पार्टियां अतिपिछड़ी जातियों को गोलबंद करने में जुटी है।

 

भीतरघात रोकना दोनों गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती
एनडीए और महागठबंधन के लिए भीतरघात रोकना बड़ी चुनौती है। शुरूआत में महागठबंधन के उम्मीदवार का कांग्रेस ने पुरजोर विरोध किया था। फिलहाल ऊपरी तौर पर कांग्रेस साथ दिख रही है। वहीं भाजपा और जदयू के बीच कोई खटपट तो नहीं दिख रहा लेकिन भाजपा के कुछ नेता विरोध जता रहे हैं। अति पिछड़ी वर्ग से आने वाले कुछ नेता निष्क्रिय दिख रहे हैं। जदयू ने तीसरी बार एक ही प्रत्याशी को मैदान में उतारा है। इस बार कई नेता चेहरा बदलने की आस लगाए थे, लेकिन पुराने चेहरे को तरजीह देने से कई नेता निराश हैं।

 

चुनाव में उतरने से बचती रही है प्रमुख पार्टियां
नालंदा सीट की एक और खासियत है कि प्रमुख पार्टियां यहां खुद चुनाव लड़ने से बचती रही हैं। पिछले चुनाव में भी जिले में सांगठनिक रूप से कमजोर लोजपा के कंधे पर बंदूक रखकर भाजपा ने निशाना साधने की कोशिश की थी। इस बार महागठबंधन की ओर से राजद-कांग्रेस ने जिले में सांगठनिक रूप से कमजोर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के प्रत्याशी के कंधे पर बंदूक रख दिया है।

 

23 सालों से एनडीए का कब्जा
नालंदा लोकसभा सीट पर पिछले 23 सालों से एनडीए का कब्जा है। 1996 और 1998 में समता पार्टी के टिकट पर और 1999 में जदयू के टिकट पर जॉर्ज फर्नाडिस यहां से चुनाव जीते। 2004 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस सीट से दिल्ली पहुंचे। हालांकि 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 2009 और 2014 में जदयू से कौशलेंद्र कुमार चुने गए।

 

जब कार्यकर्ताओं ने नेता को खरीदकर दी सेकेंड हैंड जीप
3 बार सीपीआई से सांसद रहे विजय कुमार यादव बताते हैं कि उनके पास प्रचार के लिए वाहन नहीं था। 1984 में कार्यकर्ताओं ने ही सेकेंड हैंड जीप खरीदकर दी थी। 15 हजार में जीप खरीदी गयी थी। यादगार के रूप में आज भी वह जीप रखी है। पहले प्रचार इतना खर्चीला नहीं था। दीवार लेखन, पर्चा आदि से प्रचार होता था। गांव-गांव में बैठकें होती थी। जहां शाम हुई, वहीं रुक गए। गांव वाले ही खाने और सोने की व्यवस्था करते थे। एक दिन में 14-15 किलोमीटर पैदल चलना होता था। उनकी बहू व पेशे से शिक्षिका धर्मशीला कुमारी बताती हैं कि वे रात को प्रचार से वापस आने पर गर्म पानी से पैर सेंकते थे। रोज सुबह 5 बजे प्रचार के लिए निकल जाते थे।

 

चुनाव में स्थानीय मुद्दे हवा-हवाई
नालंदा में मुद्दे की जगह जातीय गोलबंदी ही हावी दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नालंदा में काफी विकास किया है। लेकिन, एयर स्ट्राइक के बाद यहां एकाएक सारे मुद्दे हवा-हवाई हो गई है। स्थानीय मुद्दे गौण है और चेहरे हावी हैं। एनडीए प्रधानमंत्री मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अपना झंडा गाड़े हैं वहीं महागठबंधन जातियों को गोलबंद करने में जुटा है।

 

लोकसभा का चुनावी गणित
कुर्मी बहुल नालंदा लोकसभा सीट पर मुस्लिम और यादवों की भी अच्छी संख्या है। यहां कुर्मी करीब 24%, यादव-15%, मुस्लिम-10% और अतिपिछड़ी जातियां 15 प्रतिशत हैं। सवर्ण वोटरों की भी अच्छी तादाद है। नालंदा संसदीय क्षेत्र में वोटरों की कुल संख्या 21,02,410  है। इसमें से 11,14,006 पुरुष और 9,88,325 महिला वोटर हैं। इस संसदीय क्षेत्र के तहत विधानसभा की 7 सीटें आती हैं-नालंदा, अस्थावां, हरनौत, इसलामपुर, राजगीर, बिहारशरीफ और हिलसा। 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में इन 7 सीटों में से 5 पर जदयू और एक-एक सीटों पर भाजपा और राजद को जीत मिली थी।

 

नालंदा सीट एक नजर-

 

साल जीते हारे
1952 कैलाशपति सिंह(कांग्रेस) चंद्रिका सिंह(निर्दलीय)
1957 कैलाशपति सिंह(कांग्रेस) कृष्ण प्रसाद सिन्हा(निर्दलीय)
1962 सिद्देश्वर प्रसाद(कांग्रेस) विजय कुमार यादव(सीपीआई)
1967 सिद्देश्वर प्रसाद(कांग्रेस) केएनपी सिंह(बीजेएस)
1971 सिद्देश्वर प्रसाद(कांग्रेस) श्याम सुंदर प्रसाद(बीजेएस)
1977 बीरेंद्र प्रसाद (बीएलडी) विजय कुमार यादव(सीपीआई)
1980 विजय कुमार यादव(सीपीआई) सिद्देश्वर प्रसाद(कांग्रेस यू)
1984 विजय कुमार यादव(सीपीआई) पंकज कुमार सिन्हा(कांग्रेस)
1989 राम स्वरूप प्रसाद(कांग्रेस)     विजय कुमार यादव(सीपीआई)
1991 विजय कुमार यादव(सीपीआई) राम स्वरूप प्रसाद(कांग्रेस)
1996 जॉर्ज फर्नाडिस(समता पार्टी) विजय कुमार यादव(सीपीआई)
1998 जॉर्ज फर्नाडिस(समता पार्टी) राम स्वरूप प्रसाद(राजद)
1999 जॉर्ज फर्नाडिस(जदयू) गया सिंह(सीपीआई)
2004 नीतीश कुमार(जदयू) कुमार पुष्पंजय(एलजेएनएसपी)
2009 कौशलेंद्र कुमार(जदयू) सतीश कुमार(लोजपा)
2014 कौशलेंद्र कुमार(जदयू) सत्यनंद शर्मा(लोजपा)
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