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निर्भया के भाव शून्य चेहरे कर रहे कई सवाल

एक वर्ष पहले
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ये जो आसमान अभी तक नीला था, अचानक लाल हो गया। एक चीख निकली है नितांत शांति को चीरती हुई और गुम हो गई अंधेरे में लेकिन इस चीख से निकले सवाल अभी जिंदा हैं, निर्भया अभी जिंदा है।
निर्भया का सवाल हजारों मोमबत्तियों की लौ की तरह जल रहा है, ज्वलंत है, आखिर कब तक और क्यों है ये हैवानियत, ये वहशीपन, ये दरिंदगी जिसके आगे सारी प्रार्थना, सारा गुहार शून्य हो जाता है। ऐसे सभी सवालों के साथ निर्भया सांस ले रही है, जिंदा है।

रवि घोष की किताब \\\"निर्भया अभी जीवित है\\\', ऐसे ही सवालों को अपनी कविताओं में उठाकर हमें दस्तक दे रही है। रवि लिखते हैं-

हर रोज निर्भया मरती है/ हर रोज निर्भया जी उठती है/वह मां है/ छाती का दूध पिलाती है/ वह व्यथित है...

यह कविता सृजन के दिव्य चेहरे का पोट्रेट बनाती है जिसमें मां का निःस्वार्थ भाव समाया है। इस भाव को किसने शून्य किया, जो भाव तिलक हर माथे पर लगता है जब मां प्यार से माथा चूमती है। इसी भाव रूप को रवि घोष अपने कविता संग्रह में बड़ी संजीदगी से साकार करते हैं।

कविता संग्रह पटना के वातायन प्रकाशन से छपी है जिसमें निर्भया को केंद्र में रखकर नारी का संपूर्ण आयाम लेखक ने रचा है। इसमें कुल 183 कविताएं हैं जो नारी के प्रति सम्मान भाव रखने का आग्रह करती हैं।

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