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विजय कुमार, पटना. बिहार में सोलहवीं विधानसभा ऐसी है जिसमें पक्ष-विपक्ष एक ही घोषणा पत्र को लागू करने में जुटे हैं। उपलब्धि गिना रहे हैं। सवाल उठा रहे हैं। विधानसभा का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प होगा। चुनाव में पक्ष-विपक्ष जिस मुद्दे के सहारे हमला बोलेंगे, वह है सात निश्चय। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसने बिहार के प्रमुख दलों को एक ही प्लेटफार्म पर खड़ा कर रखा है। सभी दलों का सात निश्चय से सीधा जुड़ाव है।
2015 में जदयू, राजद और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनावी घोषणा पत्र जारी करने की बजाए सात निश्चय को ही अपना एजेंडा घोषित किया। नतीजा बिहार में महागठबंधन की सरकार बन गई। 2017 में जदयू ने भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना ली। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र को किनारे रखा और सात निश्चय ही नई सरकार भी एजेंडा बन गया।
नीतीश के सात निश्चय के अवयवों की स्थिति
लक्ष्य नहीं कमिटमेंट: वशिष्ठ
जदयू प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण कहते हैं कि 7 निश्चय हमारा जनता से कमिटमेंट है। हमने काम किया है।
निश्चय ही भूल गए : तेजस्वी
सरकार निश्चय भूल गई। काम नहीं हो रहा है। जहां काम हो भी रहा है, उनमें घोटाले सामने आने लगे हैं।
हिसाब दो-हिसाब लो
चुनाव 2020 में एनडीए सात निश्चय पर वोटों का इनाम मांगेगा। वहीं विपक्ष इन्हीं की विफलताओं को उजागर करेगा।
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