पटना का पुस्तक मेला ललचाता है, बार-बार खींचता है : नवीन जोशी

Patna News - प्रसिद्ध कहानीकार और संपादक नवीन जोशी पटना पुस्तक मेला के बारे में कहते हैं - \" पटना का पुस्तक मेला ललचाता है ,...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 09:31 AM IST
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प्रसिद्ध कहानीकार और संपादक नवीन जोशी पटना पुस्तक मेला के बारे में कहते हैं - " पटना का पुस्तक मेला ललचाता है , बार-बार खींचता है। समाज में किताब और लेखकों की ऐसी कद्र देखकर गर्व होता है पर किताबों का ऐसा उत्सव मनाने वाला पटना या बिहार पिछड़ा क्यों है? वह किस रूप से पिछड़ा है ? विकास के प्रचलित मानकों का, किताबों और इतने पढ़ने लिखने वालों से क्या रिश्ता है ? क्या लेखक और किताबें समाज से कोई सीधा हस्तक्षेप करती हैं ? कहते हैं किताब मनुष्य को सचेत और निर्भय बनाती है। बिहार जिसका जीता जागता उदाहरण है।"

दिल्ली जा बसे बिहार के वरिष्ठ साहित्यकार और उपन्यासकार डॉ भगवती शरण मिश्र का मानना है - " विगत दो- तीन दशकों से आयोजित हो रहे पटना पुस्तक मेला ने बिहार को एक नई पहचान दी है और पुस्तक व्यवसाय में इस राज्य को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर रखा है। देश की राजधानी में रहने वाला एक बिहारी होने के नाते मुझे पटना पुस्तक मेला के हर बार के सफल आयोजन से बेहद खुशी होती है । यह खुशी उस वक्त और बढ़ जाती है जब दिल्ली और प्रदेश के दूसरे राज्यों में इसके सफल आयोजन को उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। मेरी नजर में पटना पुस्तक मेला बिहार का अप्रतिम उपलब्धि है।

भगवती शरण मिश्र कहते हैं कि मैं पटना पुस्तक मेला को मिस करता हूं। दिल्ली में पुस्तक मेला के कई आयोजन लेकिन जिस उत्साह से , जिस गर्मजोशी से, और जिस ललक से बिहार में किताबों की खरीदारी होती है, लिखो का साहित्यकारों का सम्मान होता है। वह यहां देखने को नहीं मिलता। लोग पटना पुस्तक मेला का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते थे । आयोजकों ने कई बार इस अंतराल को कम करते हुए लगातार प्रत्येक वर्ष मेला आयोजन करने की परंपरा शुरू की है। हर वर्ष मेला में लाखों लोगों का आगमन और करोड़ों रुपए की पुस्तक खरीद, यह बेहद चौकाती है।

पटना पुस्तक मेला अपने शुरुआती दिनों से पुस्तकों की खरीद बिक्री के अलावा अन्य सांस्कृतिक - साहित्यिक और वैचारिक गतिविधियों का केंद्र बनने की दिशा में प्रयासरत रहा। मेले में हर दिन, देर शाम तक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत होते। शुरुआती दिनों में आकाशवाणी और दूरदर्शन के कलाकारों के अतिरिक्त पटना और उसके आसपास के कलाकार रंगकर्मी मंच के पिछले हिस्से में बनाए गए मंच पर अपनी प्रस्तुति देते।

इस आयोजन से मेला को यह फायदा होने लगा कि कला - संगीत प्रेमी देर रात पटना पुस्तक मेला बंद होने के समय लगभग 8:30 बजे तक वे डटे रहते। हालांकि 90 के दशक के शुरुआती वर्षों में सांस्कृतिक कार्यक्रम मेला का हिस्सा नहीं बन पाया था लेकिन इस आयोजन के बहाने संस्कृति कर्मियों , कलाकारों का जुड़ाव पटना पुस्तक मेला से गहरा होता चला गया। कलाकार अपने जान-पहचान वालों और मित्रों को मेला के भव्य मंच पर अपना कार्यक्रम दिखाने के लिए उन्हें बुलाते। इन कार्यक्रमों में लोक संस्कृति और शास्त्रीय संगीत दोनों को समान रूप से तवज्जो मिलता। यह बात सही है कि लोक नृत्य और लोकगीत सुनने ज्यादा लोग जमा होते थे जबकि शास्त्रीय गायन या शास्त्रीय नृत्य को देखने - सुनने कम लोग जमा होते। यह सिलसिला 90 के दशक तक चला। अब तक मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भजन, गजल, गायक- कलाकार, वादक कलाकार ही बुलाए जाने लगे। सांस्कृतिक मंच अब पीछे से निकलकर मुख्य द्वार पर आ गया था। 1996 और 1996 का पटना पुस्तक मेला जनसंवाद के कारण अपनी लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा । जनसंवाद में देश की चोटी के राजनीतिज्ञ, पुलिस -प्रशासनिक अधिकारी, लेखक , पत्रकार , अर्थशास्त्री समाजसेवी और अन्य चर्चित हस्तियों को आमंत्रित किया जाने लगा। ज्वलंत मुद्दों पर विचार मंथन भी शुरू हुआ।

इन कार्यक्रमों में इतनी भीड़ उमड़ने लगी के प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं ने इस पर आपत्तियां दर्ज करानी शुरू कर दी । किसी के लिए उस वक्त स्टालों की विरानगी मायूसी का कारण बना, तो किसी के लिए ऐसे आयोजनों की समाप्ति के बाद अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रित करने में परेशानी होने लगी । बड़ी राजनीतिक हस्तियों के आगमन से उनके समर्थकों और प्रशंसकों की भारी भीड़ सचमुच मेला व्यवस्था संभालने वालों के लिए एक बड़ी चुनौती बनने लगी थी ।

नवीन जोशी

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29 साल से पुस्तक मेला से जुड़े लेखक और पत्रकार डाॅ. ध्रुव कुमार सिटी भास्कर के लिए लिख रहे हैं अतीत की यादें

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