लोगों ने कहा था, शादी कर लो पर संकल्प था आईएएस

3 वर्ष पहले
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पुरुष भी अपने काम और घर के साथ रिश्ते को अच्छी तरह निभाते हैं। हम भी तो वही करते हैं। - सीमा ित्रपाठी

एकता कुमारी। पटना

बिहार राज्य परिवहन आयुक्त, आईएएस सीमा त्रिपाठी इलाहाबाद के मिडिल क्लास फैमिली से बिलांग करती हैं। स्वभाव से काफी सरल और सुलझी सीमा जब आईएएस की तैयारी शुरू कीं तो समाज के तानों से भी गुजरना पड़ा। लोग कहते कि तैयारी कर क्या करोगी, शादी करो और घर बसाओ। लोगों की बातों से विचलित होने के बजाय उन्होंने अपने संकल्प और इच्छाशक्ति को और मजबूत बनाया। लक्ष्य की और बढ़ती रहीं। पहली बार की असफलता ने लोगों को उनके खिलाफ बोलने के लिए और मुखर किया लेकिन कड़ी मेहनत से दूसरी बार सफल होकर उन्होंने बोलने वालों का मुंह बंद कर दिया। आईएएस बनने के बाद समाज, ऑफिस और घर में संतुलन बनाना बड़ी चुनौती थी लेकिन परिवार के साथ वर्क को मैनेज करना उन्हें बखूबी आता है। वह कहती हैं कि महिलाओं के बारे में ये बार-बार पूछा जाता है कि काम और परिवार के बीच कैसे बैलेंस करती हैं? लेकिन मुझे पुरुषों और महिलाओं के काम में बेसिक अंतर नहीं दिखता क्योंकि पुरुष भी अपने काम और घर के साथ रिश्ते को अच्छी तरह निभाते हैं। डेली रूटीन, स्वास्थ्य और अन्य चीजों की देखभाल करना वो भी बखूबी जानते हैं। फर्क बस इतना है कि महिलाओं की प्रतिबद्धता हर मिनट की होती है और पुरुषों की इसकी तुलना में कम। मेरी बेटी अभी छोटी है। उसे संभालना थोड़ा मुश्किल तो होता है लेकिन मैं मैनेज कर लेती हूं। आज मैं जहां भी हूं उसका क्रेडिट मेरी मां को जाता है। उन्होंने कभी भी बेटे और बेटी में भेद नहीं किया।

सीमा त्रिपाठी बताती हैं कि महिलाएं किसी भी पद को जिम्मेदारी के साथ निभाती हैं। वह किसी भी जगह खुद को समायोजित कर लेती हैं। पूरी ईमानदारी के साथ वह अपनी ड्यूटी निभाती हैं। वैसे भी पुरुष की तुलना में एक महिला का दर्द दूसरी महिला अच्छे से महसूस कर सकती हैं। मुझे घर-परिवार से बगावत कर नौकरी में नहीं आना पड़ा लेकिन ऐसा नहीं है कि समाज में बातें नहीं होती हैं। जब आप किसी परीक्षा की तैयारी कर रहे होते हैं तो उस वक्त समाज यही कहता है, कहां तैयारियों में लगे हो, शादी कर लो, तो ये भी एक तरह का संघर्ष ही हुआ, जिससे जूझना पड़ता है। महिलाओं पर खासकर इस तरह का संघर्ष ज्यादा है। समाज में लड़कियों पर एक उम्र के अनुसार शादी का दवाब बनना शुरू हो जाता है, लेकिन महिलाएं मानसिक रूप से सशक्त हो गई हैं। वे स्ट्रगल कर आगे बढ़ रही हैं। हालात बदले हैं लेकिन महिलाएं आज भी असुरक्षित हैं। आर्थिक रूप से वो मजबूत तो हुई हैं लेकिन सामाजिक रूप से अभी भी उन पर बंदिशें हैं। बदलता माहौल आज भी उनके अनुकूल नहीं है। जरूरी है लड़के और लड़कियों को बचपन से ही एक-दूसरे के साथ पढ़ाया जाए ताकि एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना पैदा हो।

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