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रीढ़ की हड्डी में गोली लिए जी रहे मौत से मुश्किल जिंदगी, एक संघर्ष की दोषी को मिले सजा

आठ साल से रीढ़ की हड्डी में गोली लिए बिस्तर पर पड़े रवींद्र कुमार यादव के लिए जिंदगी मौत से मुश्किल हो गई है।

विवेक कुमार | Last Modified - Jun 12, 2018, 11:37 AM IST

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    रवींद्र यादव आठ साल से बिस्तर पर पड़े हैं। उनके कमर के नीचे का हिस्सा बेजान है।

    पटना.आठ साल से रीढ़ की हड्डी में गोली लिए बिस्तर पर पड़े रवींद्र कुमार यादव के लिए जिंदगी मौत से मुश्किल हो गई है। मौत को करीब से देखने के बाद वह सिर्फ इस उम्मीद में जिये जा रहे हैं कि जिसने यह हालत की उसे सजा दिलानी है। 29 सितंबर 2010 की घटना को वह ऐसे सुनाते हैं जैसे कल की ही बात हो। कहते हैं गांव के ही अरविंद राय से जमीन को लेकर विवाद था। उस दिन इसी बिस्तर पर मैं लेटा था। पास में मां बैठी थी। अरविंद और उसके साथी आए और मुझपर हमला कर दिया। पीठ पर पहले कार्बाइन से गोली चलाई इसके बाद पास आकर कट्टा से गोली मार दी। गांव के लोग देखते रहे, किसी को हिम्मत नहीं थी उसे रोकने की। गोली रीढ़ की हड्डी में लगी थी। घरवाले मुझे पहले मुजफ्फरपुर फिर पीएमसीएच पटना ले गए। जान तो बच गई, लेकिन स्पाइनल कॉर्ड में गोली लगने से कमर के नीचे का हिस्सा बेजान हो गया। पटना से लेकर दिल्ली तक इलाज कराया, लेकिन कुछ न हुआ।

    सड़ गया कमर के नीचे का हिस्सा
    लगातार बेड पर पड़े रहने के चलते मुजफ्फरपुर के मनियारी थाना के सुस्ता माधोपुर निवासी शिक्षक रवींद्र के कमर के नीचे हिप्स पर बड़े घाव हो गए। ऑपरेशन कर एक को ठीक कराते तो दूसरा हो जाता। दोनों हिप्स का बड़ा हिस्सा सड़ गया है। रोज घाव की ड्रेसिंग करनी पड़ती है। ऑपरेशन कर शरीर में कैथेटर डाल दिया गया है। पत्नी अनुराधा दिन रात देखभाल में जुटी रहती है। कहती हैं इनके इलाज में पिछले आठ साल में करीब 20 लाख रुपए खर्च हो गए। एक बेटा और एक बेटी है। परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। ये बेड पर से उठ नहीं सकते। ड्रेसिंग के लिए एक कम्पाउंडर पहले आते थे। रोज 500 रुपए देने पड़ते थे। घर में खाने को पैसे नहीं है रोज कम्पाउंडर को कहां से 500 रुपए देती। इसलिए ड्रेसिंग मैंने सीख ली।

    डॉक्टर की गवाही के चलते रुका है केस
    रवींद्र का केस मुजफ्फरपुर के ADJ6 राधे श्याम शुक्ल के कोर्ट में है। केस पीएमसीएच के रिटायर्ड डॉक्टर के. के. केशरी की गवाही न होने के चलते अटका हुआ है। 29 सितंबर 2010 को गंभीर हालत में रवींद्र को पीएमसीएच ले जाया गया था। डॉक्टर के.के. केशरी ने उनका इलाज किया था। केस की सुनवाई के दौरान अब कोर्ट में केशरी की गवाही जरूरी है। इस संबंध में अपर लोक अभियोजक कृष्ण देव साह ने पीएमसीएच को पत्र लिखा और निवेदन किया कि डॉ केशरी या उस समय उनके साथ काम करने वाले किसी अन्य डॉक्टर, कम्पाउंडर या ऑफिस के किसी अन्य कर्मचारी को भेजा जाए जो डॉ केशरी की लिखावट और साइन को पहचान सके। डॉक्टर की गवाही के बिना रवींद्र का केस आगे नहीं बढ़ रहा है। वह न्याय की आस लिए बिस्तर पर पड़े हैं और उन्हें गोली मारने वाले खुलेआम घूम रहे हैं। 11 जून को कोर्ट में सुनवाई हुई, लेकिन गवाही देने न डॉक्टर आए और न पीएमसीएच का कोई कर्मी। 24 जुलाई को अब अगली सुनवाई होगी।

    बेड और व्हीलचेयर पर सिमट गई जिंदगी
    रवींद्र की जिंदगी बेड से लेकर व्हीलचेयर तक सिमट गई है। कहते हैं दिन पर यहां पड़े-पड़े कई बार लगता है कि क्यों जी रहा हूं। मुझे गोली मारने वाले खुलेआम सीना ताने घूम रहे हैं। फिर अंदर से आवाज आती है अगर यूं ही मर गया तो उसे सजा कौन दिलाएगा। इसी उम्मीद में जी रहा हूं कि एक न एक दिन मुझे न्याय मिलेगा। बेड के बगल में रखे व्हीलचेयर की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं कि घर से बाहर जाने का एक मात्र सहारा यह व्हीलचेयर है। रिचार्जेबल बैट्री की दम पर यह एक बार में तीस किलोमीटर तक जा सकता है। केस की सुनवाई हो या डॉक्टर के पास जाना। घर से बाहर निकलना होता है तो दो दिन पहले से उत्साहित रहता है। बाजार में कोई दुकान दिख जाए तो ठहरकर देखता हूं।

    बच्चों के भविष्य की है चिंता
    रवींद्र एक सरकारी स्कूल में टीचर हैं। गोली लगने के बाद वह 40 माह तक लगातार स्कूल न जा पाए थे। सितंबर 2010 में गोली लगी और अक्टूबर से ही वेतन बंद हो गया। इलाज में घर की जमा पूंजी चली गई। काफी कर्ज हो गया है। रवींद्र कहते हैं कि अभी हर माह मेरे इलाज पर 5-6 हजार रुपए खर्च होते हैं। आज बच्चे स्कूल जा रहे हैं, लेकिन आगे उन्हें कहां तक पढ़ा पाऊंगा पता नहीं। एक उम्मीद है कि कोर्ट से फैसला आने पर मुआवजा के रूप में कम से कम पांच लाख मिलेंगे, लेकिन कब पता नहीं।

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    रवींद्र यादव की पीठ का एक्स रे फोटो, जिसमें गोली (लाल घेरे में) दिख रही है।
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    बैट्री से चलने वाली रवींद्र यादव की व्हील चेयर।
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    पत्नी अनुराधा दिन रात देखभाल में जुटी रहती है।
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