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याद है हर की पौड़ी, ओस की बूंदों के साथ शाम और दीप मालाएं

नई-नई जगहों की यात्राएं मुझे रोमांचित करती रही हैं। अवसर की तलाश और प्रतीक्षा रहती है। हाल में दिल्ली जाने का मौका...

Dainik Bhaskar

Sep 10, 2018, 05:10 AM IST
Patna - याद है हर की पौड़ी, ओस की बूंदों के साथ शाम और दीप मालाएं
नई-नई जगहों की यात्राएं मुझे रोमांचित करती रही हैं। अवसर की तलाश और प्रतीक्षा रहती है। हाल में दिल्ली जाने का मौका मिला। रोज सुबह रोहिणी के डिस्ट्रिक्ट पार्क में जाता और फूलों से बातें करता। मन आनंदित हो जाता। शाम छह बजे कुछ बुजुर्गों के साथ गप्पे मारता। यहां कुछ-कुछ दूरी पर पार्क बनाए गए हैं। पटना लौटकर भी उन फूलों की याद ताजा है। एक दिन हरिद्वार यात्रा की योजना बनी। हर और द्वार इन दो शब्दों के मेल से बना है हरिद्वार। यह गेट वे टू लॉर्ड शिवा है। दूसरे अर्थ में हर का मतलब विष्णु और द्वार। अर्थात बद्रीनाथ जाने का रास्ता भी यहीं से है। हरिद्वार देवी सती का घर तथा उनके पिता दक्ष प्रजापति के महल के लिए भी जाना जाता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग(629 ई.) ने इस स्थल का नाम मायापुरी(मो-यू-लो) बताया है। महाभारत के वन पर्व में ऋषि धौम्य युधिष्ठिर को गंगा द्वार यानी हरिद्वार और कनखल का महत्व बताते हैं। कहा गया है कि गंगा केवल पृथ्वी पर ही नहीं, बल्कि स्वर्ग में भी बहती है। इसीलिए गांधीवादी लेखक काका कालेलकर ने गंगा को त्रिपथगा कहा है। इसके प्रवाह से गति की कामना की गई है।

हरिद्वार में यात्रियों का मुख्य कार्य स्नान है। देवदर्शन का भी यहां पुण्य-लाभ है। पिंड-दान, तर्पण के साथ यहां अस्थियां भी प्रवाहित की जाती हैं। गंगा की शोभा देखने का अवसर सबसे पहले यहीं प्राप्त होता है। हरिद्वार पहुंचकर सबसे पहले हमलोग हर की पौड़ी(ईश्वर का घाट) गए। यहां गंगा की अविरलता एवं नर्मलता देखकर अपूर्व सुख की अनुभूति हुई। यहां स्नान के बाद मन शीतल हो गया। प|ी और बच्चों ने भी डुबकी लगाई। आप परिवार के साथ हों, तो यहां आना और भी आनंददायी हो जाता है। यह स्थल ब्रह्मकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। यहां लोगों की सुविधाओं का ध्यान रखा गया है। महिलाओं के कपड़े बदलने के लिए भी स्थान बने हुए हैं। हरिद्वार स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर यह प्रसिद्ध घाट पत्थर का बना है। दाहिनी ओर दो-तीन मंदिर हैं। हरि की पौड़ी घाट पर उत्तर की ओर दीवार के नीचे हरि का चरण चिह्न है। घाट के बीच पानी से थोड़ा ऊपर एक छोटा पुल बना हुआ है। प्लेटफॉर्म और पौड़ियों के बीच में जहां गंगा की धारा है, उसी स्थान को ब्रह्मकुंड कहा जाता है। कहा जाता है कि यहीं ब्रह्मा ने यज्ञ संपादित किया था। यहीं ब्रह्मा मंदिर भी है। हर की पौड़ी का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने भाई की याद में कराया था। वह यहां बैठकर ध्यान लगाते थे। दूसरे दिन हमने मनसा देवी मंदिर जाना तय किया। यह ब्रह्मकुंड से पश्चिम-उत्तर में शिवालिक पहाड़ियों के बीच स्थित है। हम केबलकार से रवाना हुए। रास्ते में पेड़-पौधे, जंगल, चट्टान, नदी, झील की तरह जगह-जगह एकत्रित जल अद्भुत नजारा पेश कर रहा था। मंदिर में देवी की दो प्रतिमाएं हैं। एक प्रतिमा की पांच भुजाएं एवं तीन मुंह हैं। दूसरी प्रतिमा की आठ भुजाएं हैं। चंडी देवी मंदिर के दर्शन भी खास हैं। यह गंगा पार नील पर्वत की चोटी पर है, जो दूर से ही दिखता है। पगडंडी, पक्के मार्ग या रज्जू मार्ग से यहां पहुंचा जा सकता है। हम 25 मिनट में उड़नखटोला से यहां पहुंच गए। मंदिर का निर्माण 1886 में जम्मू के राजा सुचेत सिंह ने कराया था।

कृष्णकांत शर्मा

यात्रा वृत्तांत

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