पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

अपने हिस्से की तीन राेटियाें में से भी दाे बांट देते थे सूफी

एक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
शिक्षा देेने के साथ संवारी दिल की दुनिया

हजरत वारिस बनारसी की सेवा में लगभग 20 छात्र थे। खानकाह का खर्च सिर्फ भेंट और दान से चलता। एक किलाे आटे में उन दिनाें साठ राेटियां पकतीं और प्रत्येक के हिस्से में तीन राेटियां आतीं। परिणामस्वरूप अधिकतर छात्राें ने अपने खाने-पीने के लिए दूसरे स्थानाें पर प्रबंध कर लिया था। किंतु आप तीन राेटियाें काे भी अधिक समझते हुए एक ही राेटी पर संताेष करते और अपने हिस्से की दाे राेटियाें काे खानकाह के सेवकाें में बांट देते। इन विशेषताओं ने हजरत वारिस बनारसी काे आपकी तरफ आकर्षित कर लिया।

हजरत माैलाना वारिस बनारसी शरियत के विद्वान के साथ ही महान सूफी संत थे। दाेनाें प्रकार के लाभ के लिए आपका दरवाजा सदा खुला रहता। आप अपने गुरु काे शिक्षण कार्य के साथ ही दिल की दुनिया काे संवारने में भी व्यस्त देखा करते, साधना और तप करते देखा करते। इससे आपका मन भी उनसे लाभान्वित हाेने के लिए प्रेरित हाेता। अपनी इच्छा गुरु हजरत शाह इमादुद्दीन के समक्ष प्रकट की, ताे सराहना के साथ आज्ञा मिल गई। फलस्वरूप सात वर्षाें तक आपने हजरत माैलाना वारिस बनारसी की सेवा में बिताया और विशेष रूप से सूफी तरीक-ए-वरसिया ओवैसिया व दरूदिया काे पूर्ण रूप से प्राप्त किया और 1123 हि. में खिरका-ए-खिलाफत व उसका प्रमाणपत्र (सनद) भी प्राप्त किया। 1122 हि. में जब आप बनारस से अपने पैतृक स्थान फुलवारीशरीफ आए थे, तभी हजरत शाह इमादुद्दीन कलंदर फुलवारवी से सिलसिला-ए- आलिया कादरिया कुतबिया मुजीबिया में मुरीद हाेने का गाैरव प्राप्त कर लिया था।

(बिहार में सूफी परंपरा पुस्तक से)

सैयद शाह शमीमुद्दीन मुनएमी

हजरत पीर मुजीबुल्लाह कादरी फुलवारवी का जन्म फुलवारीशरीफ में 24 फरवरी, 1687 में हुआ। आपकी आयु जब छह वर्ष से कुछ अधिक हुई, ताे पिता का देहांत हाे गया। आपका लालन-पालन और शिक्षा फूफा हजरत शाह बुरहानुद्दीन (लाल मियां) की देखरेख में हुई। हजरत लाल मियां खुद सूफी संत थे। पवित्र कुरआन और फारसी की प्रारंभिक पुस्तकें आप ही से पढ़ीं। हजरत लाल मियां के स्वर्गवास के बाद आपका शैक्षणिक क्रम उनके पुत्र और फुफेरे भाई हजरत शाह इमामुद्दीन कलंदर जाफरी फुलवारवी की देखरेख में प्रारंभ हुई। यहां आपने भाषा, व्याकरण, धर्म और दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। हजरत कलंदर भी पारंगत सूफी संत थे। यहां रहते हुए आपने हजरत माैलाना मुहम्मद वारिस कादरी बनारसी की चर्चा सुनी, ताे उनका दर्शन पाने के लिए व्याकुल हाे गए। अपने गुरु हजरत इमामुद्दीन की सेवा में उपस्थित हुए और विनम्रता के साथ इच्छा जताई। आज्ञा पाकर अपने हमउम्र हजरत शाह मुहम्मद मखदूम के साथ बनारस प्रस्थान कर गए।

शुरू से ही आप जिज्ञासु और बुद्धिमान थे। यहां भी अधिकतर समय पढ़ने में बिताते। आपने अनुभव किया कि पढ़ने के क्रम में नींद आने लगती है। आपने नींद की इस बाधा काे दूर करने का अच्छा उपाय निकाला। आपने केश बढ़ा लिए और जब नींद आने लगती, ताे एक रस्सी से बालाें काे बांध लेते और फिर उस रस्सी काे छत से बांध देते। जहां बैठते, वहां नीचे कंकड़ फैला देते, ताकि ये कंकड़ हमेशा चुभते रहें। इस तरह आपने नींद काे दूर भगा दिया।
खबरें और भी हैं...