सिजनल फ्लू की तरह ही फैलता है स्वाईन फ्लू भी खांसी-बुखार, गले में खराश हाे ताे न रहें लापरवाह

Patna News - स्वाइन फ्लू के लक्षण मिलने पर विषाणु रोधी(एंटीवायरल) दवाओं का उपयोग एवं विश्राम करना चाहिए। आयुर्वेदिक औषधि में...

Mar 24, 2020, 07:51 AM IST

स्वाइन फ्लू के लक्षण मिलने पर विषाणु रोधी(एंटीवायरल) दवाओं का उपयोग एवं विश्राम करना चाहिए। आयुर्वेदिक औषधि में संजीवनी बटी, मृत्युजंय रस, नारदीय लक्ष्मी विलास रस, गिलोयघन बटी लाभदायक है। तुलसी, गिलोय, सहजन, कालमेघ स्वरस भी कारगर है। लौंग, काली मिर्च, हल्दी, मुलेठी का काठा मुन्नका एवं अंजीर मिला कर लेने से काफी फायदा होता है। मेन्थॉल(पुदीने)से तैयार तेल गले एवं सिर में लगाने से राहत मिलती है। गर्म पानी लेना चाहिए। पानी खूब पीना चाहिए, क्योंकि शरीर में पानी की कमी होने लगती है।

लाभदायक है संजीवनी बटी के साथ ही मृत्युजंय रस और गिलोयघन बटी

हाेम्याेपैथ में प्रत्येक आउटब्रेक में लक्षणाें का अध्ययन कर ‘जेनस एपिडेमिक’ तय किया जाता है। एेसा इसलिए जरूरी है क्याेंकि आमताैर पर वायरस के शरीर के बाहरी आवरण की संरचना बराबर बदलती रहती है। }बचाव- शरीर की प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से विटामिन सी, बीटा केराेटिन, विटामिन डी एवं एंटी आॅक्सीडेंड्स प्रदान करनेवाले खाद्य या पेय पेय पदार्थाें का उपयाेग करें। }ये हैं दवाएं : इस बार के आक्रमण में जाे इसका स्वरूप दिखाई पड़ रहा है, इसमें सामान्य लक्षणाें के आधार पर जेलशियम एवं ब्रायाेनिया अल्बा, यूपाटाेरियम, आर्सेनिक एआईबी 30 के उपयाेग की सर्वाधिक संभावना है। इसके अलावा काॅम्लिकेशन पैदा हाेने पर राेगी विशेष के आधार पर दवा दी जाती है। फ्लू के लक्षण समाप्त हाेने पर आराेग्य लाभ के वक्त कमजाेरी दूर करने के लिए चायना बहुत ही उत्तम है।

हाेम्याेपैथी में भी है इलाज, कारगर है जेलशियम एवं ब्रायाेनिया अल्बा

स्वाईन फ्लू मनुष्य के श्वसनतंत्र काे संक्रमित करता है। 1919 में सबसे पहले सूअर में इसे देखा गया है। यह एच1एन1 वायरस स्टेन द्वारा हाेता है। यह सिजनल फ्लू की तरह ही फैलता है। देश में हर वर्ष यह लाखाें लाेगाें काे संक्रमित करता है, हालांकि इसका टीका उपलब्ध है, जिससे बचाव किया जा सकता है। खांसने और छींकने के दाैरान यह हवा से फैलता है। संक्रमित कंबल, दरवाजे के हैंडल एवं अन्य उपकरणाें से भी यह फैल सकता है। लार और स्किन से स्किन के संपर्क से भी यह फैलता है। इसे पिग फ्लू भी कहा जाता है।

}लक्षण : बुखार, ज्यादा खांसी, गले में खराश, नाक से पानी, आंखें लाल हाेना व पानी आना, सिरदर्द, थकावट, पतला दस्त एवं उल्टी भी हाे सकती है। वायरस से संक्रमण के एक से तीन दिनाें के अंदर तकलीफ शुरू हाेती है।

}इलाज : कई मरीजाें में सिर्फ लक्षण काे ठीक करने से बीमारी ठीक हाेती है। गंभीर बीमारी में एंटी वायरल दवा ओस्टेलामिविर (टैमी फ्लू) उपयाेग किया जाता है। हालांकि फ्लू वायरस पर इन दवाओं का असर कम हाेता जा रहा है। अत: दवाओं का उपयाेग, जहां बहुत जरूरी हाे, वहीं करना चाहिए। जैसे हाई रिस्क मरीज, बुजुर्ग, गर्भवती महिला, बच्चे। इस राेग से बचाव के लिए हाइजीन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अधिक मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन करना चाहिए। आराम करना चाहिए। पैरासिटामाेल की गाेलियां बुखार, बदन दर्द में लाभकारी हैं।

}निदान : गले या नाक से स्वाब लेकर एंटीजन का पता लगाया जाता है। यह टेस्ट 15 मिनट में हाे सकता है। इससे भी सेंसेटिव जांच रियल टाइम पीसीआर उपलब्ध है, जाे खास जगहाें पर है। जितने लाेगाें काे फ्लू है, उन सभी की जांच आवश्यक नहीं है। वैसे लाेगाें की जांच आवश्यक है, जिनपर इसके दुष्प्रभाव अधिक हाेने की आशंका है।

डाॅ. धनंजय शर्मा

उपाधीक्षक, राजकीय आयुर्वेद कालेज अस्पताल, पटना

डाॅ. आरपी सिंह

डाॅ. सुनील अग्रवाल, वरीय फिजिशियन, पीएमसीएच

X

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना