धर्म-जाति के नाम पर जो घृणा नहीं करे, वही है सच्चा धार्मिक

Patna News - रुनानक जी महाराज भविष्यद्रष्टा थे। उन्हाेंने आध्यात्मिकता और नैतिकता से प्रेरित कर्मयुक्त जीवन का सपना देखा...

Nov 22, 2019, 09:10 AM IST
Patna News - the one who does not hate in the name of religion is true religious
रुनानक जी महाराज भविष्यद्रष्टा थे। उन्हाेंने आध्यात्मिकता और नैतिकता से प्रेरित कर्मयुक्त जीवन का सपना देखा था। एक ऐसे समाज की कल्पना की, जो एक ओर स्वार्थी पुरोहित वर्ग से मुक्त हो, दूसरी ओर निरंकुश राजाओं और उनके चाटुकारों से भयभीत न हो। धार्मिक झगड़ों में फंसे देश में उदार मत का उपदेश देने के लिए चार धार्मिक यात्राएं कीं। पांखड, अंधविश्वास पर आधारित कर्मकांडों का खंडन किया। कृत कर, नाम जप एवं वंड छक का संदेश घर-घर पहुंचाया। उनकी यात्रा काे उदासियां भी कहा जाता है। यात्रा 28 वर्ष की उम्र से ही शुरू की। लगभग 22 वर्षो तक पैदल यात्रा की। पीड़ित मानवता को एक प्रभु ‘एक ओंकर’ की अराधना करने तथा विभिन्न धर्मो-जातियांे के लोगों में प्रेम का संदेश दिया। सबसे पहले पूर्व की ओर कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बनारस से गया, पटना, बंगाल और असम पहुंचे। बंधुत्व की भावना का प्रचार किया। एक ही परमेश्वर की उपासना पर बल दिया, जिसकी दृष्टि में सभी समान हैंै। वे भारत के बाहर के धार्मिक केन्द्रों में भी गए। मुसलमानों को उन्हाेंने करुणा एवं वैराग्य का संदेश दिया। हिन्दुओं और मुसलमानों को भाइयों की तरह रहने की शिक्षा दी। योगियों को आध्यात्मिकता और सच्ची कर्मशीलता का संदेश दिया और चमत्कार करने से बचने की सलाह दी। गृहस्थ आश्रम को सर्वाेच्च माना। मानवता की सेवा और करुणा के बिना आध्यात्मिकता की खोज अधूरी है। विनम्रता से ही ईश्वरीय अनुकम्पा मिल सकती है। दुनिया को त्यागना नहीं चाहिए। दुनिया एक धर्मशाला है-धर्म के आचरण की जगह हैं। स्त्री जाति को पुरुष के समान अधिकार देने का नारा गुरुजी ने ही दिया। स्त्री जाति को मंदा कहने के लिए समाज के लोगों को भी लताड़ा कि ‘सो क्यो मंदा आखिये जिस जम्मे राजान’। गुरुनानक जी का विचार था कि ईश्वर कोई रूपाकार या अवतार नहीं होता, वह नाम और शब्द में वास करता हैं। उन्हाेंने पारब्रह्म को ‘एक ओंकार’ और ‘करतार’ कह कर पुकारा है। ‘वाणी’को आध्यात्मिक ज्ञानदाता के रूप में गुरु कहा गया है जो सभी प्रकार के आध्यात्मिक प्रकाश का स्रोत है। यात्राओं के दौरान यद्यपि कुछ समय के लिए उन्हाेंने पारिवारिक जीवन त्याग दिया, तथापि वे न तो संन्यासी बने, न ही फकीर। उनका उद्देश्य था सच के प्रचार के लिए जिन्दगी समर्पित करना। दुनिया में रहते हुए दुनिया के दाग से बचे रहना। अंत में वे 18 वर्षो तक परिवार के साथ रावी नदी के किनारे खेती कर अपनी जीविका चलाई। यह गुरदासपुर में ‘डेरा बाबा नानक’ के नाम से प्रसिद्व है।

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गुरुदयाल सिंह

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