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बबुआ गोवर्धन में दिखा पैरवी की डिग्री का सच

एक वर्ष पहले
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दिल्ली की टीम रंगश्री द्वारा छठा भोजपुरी नाट्य महोत्सव गुरुवार को कालिदास रंगालय में शुरू हुआ। पहले दिन बबुआ गोवर्धन नाटक का मंचन किया गया। यह नाटक आज के उन युवाओं पर एक कटाक्ष है जो विश्वविद्यालय से पैसे और पैरवी के बल पर डिग्री पा लेते हैं। बिना अपना हुनर बढ़ाए नौकरी की उम्मीद में सिर्फ हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहते हैं। इन भटके हुए युवाओं को उनके अंदर की शक्ति को पहचानने की जरूरत और उन्हें प्रेरित करना इस नाटक का उद्देश्य था। नाटक के लेखक और निर्देशक महेंद्र प्रसाद सिंह हैं। शुक्रवार को मास्टर गनेसी राम और शनिवार को बिरजू के बिआह के साथ इस नाट्य महोत्सव का समापन होगा।

क्या है कहानी : गांव का पढ़ने-लिखने वाला लड़का आलसी और काम करने से कतराता है। उसकी मां मुखिया है तो पिता प्राइमरी स्कूल के सेवानिवृत्त शिक्षक। गोवर्धन माता-पिता के कामों में हाथ नहीं बंटाता है और न ही घर के अन्य काम करता है। कॉलेज से डिग्री लेने के बाद वह ऐसी नौकरी की तलाश करता है जिसमें काम ना करना पड़े। इसी चक्कर में गांव से शहर अपने जीजा के पास चला जाता है। शहर की चमक-दमक में उसका मन बदल जाता है। जीजा के घर रहते हुए वे पुराने ढर्रे पर जिदंगी को जीता रहता है। एक दिन उसका जीजा उसकी क्षमता को पहचान उसका आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उसके जीजा उद्यमिता प्रशिक्षण केंद्र में नामांकन कराता है और उसे उद्यमी बनाते हैं। उद्यमी बन वह दूसरों को भी रोजगार देने लगता है। पिता को इसके बारे में जानकारी मिलती है तो गांव में आकर अपना काम करने की बात कहते हैं। जिसके बाद गोवर्धन तैयार हो जाता है और गांव वालों को रोजगार देता है।

नाटक के कलाकार

बबुआ गो- सौमित्र वर्मा, दीदी और मां- मीना राय, मुटुर और सूत्रधार - लव कांत सिंह, लपटु और भांजा- रुस्तम, पड़ोसन- कृति, जीजा-अखिलेश कुमार पांडेय, बाबूजी- मुन्ना कुमार यादव, लेखक व निर्देशक-महेन्द्र प्रसाद सिंह, प्रकाश- शुभम तिवारी, पार्श्व ध्वनि -आर जी श्याम।
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