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जहां कभी रोज बनती थी 500 लीटर शराब, अब महिलाएं बेच रहीं 300 लीटर दूध

पार्वती मरांडी बताती हैं-हमलोगों के लिए यह काफी मुश्किल था कि शराब के धंधे को छोड़ कुछ दूसरा काम किया जाए।

Danik Bhaskar | Mar 14, 2018, 04:51 AM IST
दुग्ध विकास समिति की सदस्य पार्वती मरांडी। दुग्ध विकास समिति की सदस्य पार्वती मरांडी।

पूर्णिया. केनगर प्रखंड का आदिवासी बाहुल्य अलीनगर गांव शराबबंदी से पहले देसी शराब बनाने के लिए जाना जाता था। सौ घर की आबादी वाले इस गांव के हर घर में देसी शराब बनती थी और उसे बेचा जाता था। शराबबंदी के बाद पारंपरिक रोजगार छिन जाने के बाद इन लोगों के मन में यह भय समा गया कि अब उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी? आज उसी गांव की महिलाएं शराब के धंधे को छोड़ श्वेत क्रांति से जुड़कर बदलाव की नई कहानी लिख रही हैं।

जिस गांव में प्रतिदिन 500 लीटर देशी शराब बनती थी, आज उसी गांव में महिलाएं रोज 300 लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन कर न सिर्फ अपने परिवार का गुजर-बसर कर रही हैं, बल्कि समाज को भी प्रेरित कर रही हैं। बदलाव की यह कहानी छह महीने पहले की है।

गांव में संचालित अलीनगर दुग्ध विकास समिति की सदस्य पार्वती मरांडी बताती हैं-हमलोगों के लिए यह काफी मुश्किल था कि शराब के धंधे को छोड़ कुछ दूसरा काम किया जाए। तभी गांव में पहली बार किसी ने सरकारी योजना से गाय खरीदी। उसे देखकर मैंने भी गाय खरीद ली। पहले दो, फिर दो से चार गाय हुईं। धीरे-धीरे दूसरी महिलाएं भी इस व्यवसाय से जुड़ने लगीं। आज गांव में 20 से ज्यादा परिवारों का भरण-पोषण गाय से ही हो रहा है। हम इस पेशे से खुश हैं। घर में भी खुशहाली आ गई है।

बच्चों को पीने तक के लिए नहीं मिलता था दूध

मनिहारी के कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहीं मोनिका बताती हैं पहली बार जब वह ब्याह कर गांव आईं तो देखा कि हर घर में शराब बन रही और बेची जा रही है। बच्चों के पीने तक का दूध नहीं मिलता था। किसी तरह परिवार की गाड़ी चलती थी। आज मेरे पास 8 गाय हंै और प्रतिदिन 80 किलो दूध बेच रहे हैं। मोनिका ने बताया कि उनके पति अशोक समिति के अध्यक्ष हैं। वे दूध की गुणवत्ता की जांच करते हैं। अब मैंने भी सीख लिया है।