फिल्म फेस्टिवल में स्थानीय फिल्मकारों व कलाकारों की उपेक्षा से रोष

Purnia News - जिले के 250वें स्थापना दिवस पर आयोजित फेस्टिवल में फिल्मकारों और कलाकारों की उपेक्षा से कलाकारों में काफी रोष है।...

Feb 15, 2020, 09:30 AM IST
Purnia News - fury of neglect of local filmmakers and artists at the film festival

जिले के 250वें स्थापना दिवस पर आयोजित फेस्टिवल में फिल्मकारों और कलाकारों की उपेक्षा से कलाकारों में काफी रोष है। इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना रहे कलाकारों का कहना है कि यह हम सभी के लिए गर्व की बात है कि हमारे जिले का 250वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। एक तरफ प्रशासन ने पूर्णिया के गौरवशाली इतिहास को समेटने की साथ-साथ कनेक्ट पूर्णिया की बात कर रही थी, लेकिन इस फेस्टिवल में पूरी तरफ से पूर्णिया के फिल्मकारों की उपेक्षा देखने को मिली। स्थापना दिवस पर आयोजित फेस्टिवल में दंगल और पंचलाइट फिल्म को प्रदर्शित किया गया।

यहां माउंट एक्पेंडिशन के दौरान 1934 में बनी फिल्म को विंग्स ओवर माउंट एवरेस्ट को 1936 में ऑस्कर मिला था। इसके अलावा 1896 में तत्कालीन पूर्णिया जिले के समेली में जन्मे हिंदी साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान और बिहार के प्रेमचंद माने जाने वाले अनूपलाल मंडल की उपन्यास मीमांसा पर 1940 में बहुरानी फिल्म का निर्माण हुआ था। फ़िल्म बहूरानी, अछूत विषय पर अपने समय की बेहद चर्चित और क्रांतिकारी फ़िल्म साबित हुई। इसके अलावा तीसरी कसम, मैथिली फिल्म ममता गाबय गीत, जीना है तो ठोक डाल जैसी फिल्म का पूर्णिया से सीधा जुड़ाव रहा है।

युवाओं को सीखने-समझने का मिलता मौक़ा : मनीष वात्सल्य

पूर्णिया के भोकराहा निवासी फिल्मकार मनीष वात्सल्य बताते हैं कि प्रशासन को फेस्टिवल में आने का निमंत्रण मिला तो अपनी व्यवस्तता के कारण से इस गौरवशाली क्षण का भागी नहीं बन सका, लेकिन स्थापना दिवस पर आयोजित फिल्म फेस्टिवल में पूर्णिया के कलाकारों के फिल्म का प्रदर्शन नहीं किया काफी खला। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म जीना है तो ठोक डाल की शूटिंग पूर्णिया में ही हुई है। फिल्म को लोगों ने काफी सराहा भी था। अगर स्थानीय फिल्मकारों और कलाकारों की फिल्म दिखाई जाती तो युवाओं को सीखने-समझने का मौक़ा मिलता।

फिल्म फेस्टिवल मंे स्थानीय कलाकारों को शामिल नहीं करना दुखद : संतोष शिवम

शहर के ही एक अन्य निर्माता इंडो-ऑस्ट्रेलियाई बैनर के तहत बनने वाली शॉर्ट फिल्म “ड्रीम कैचर” से बतौर डायरेक्टर डेब्यू करने वाले भूरी गांव के निवासी बताते हैं कि हर किसी का सपना होता है कि उसके काम की उसके घर में सराहना मिले। वे बताते हैं कि पूर्णिया जैसे छोटे शहर के युवा कलाकारों ने काफी जद्दोजहद के बाद इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई है। दुःख इस बात का है कि इस फेस्टिवल में पूर्णिया के स्थानीय कलाकारों की फिल्मों को शामिल नहीं किया गया, जब आपको घर में सम्मान नहीं मिलता है तो तकलीफ तो होती ही है। इस फेस्टिवल में स्थानीय प्रतिभा को शामिल करना चाहिए था।

पूर्णिया के कलाकार प्रतिभाशाली, नहीं मिला उचित सम्मान : रवि शाह

पान सिंह तोमर, दबंग -2, स्प्रिंग ठंडर, मराठी फिल्म परंतु और हाल में प्रदर्शित हिंदी वेब सीरीज़ ‘जामताड़ा सबका नंबर आएगा’ फेम रवि शाह बताते हैं कि उनका बचपन ही पूर्णिया की मिट्टी में गुजरा है। प्रशासन के द्वारा काफी शार्ट नोटिस में सम्मान के लिए आमंत्रित किया गया था। फिल्म फेस्टिवल में स्थानीय कलाकारों की फिल्म को शामिल नहीं किये जाने पर अचंभित रह गया। पूर्णिया के कलाकार काफी प्रतिभाशाली हैं, लेकिन फिल्म फेस्टिवल में स्थानीय प्रतिभा को उचित सम्मान नहीं मिल सका।

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