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धर्म के बिना सृष्टि के मर्म को समझना दुरूह

एक वर्ष पहले
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आनंद मार्ग प्रचारक संघ के तत्वावधान में पूर्णिया जागृति के प्रांगण में शनिवार को त्रिदिवसीय सेमिनार एवं साधना शिविर का आयोजन किया किया गया। सेमिनार में उपस्थित साधक साधिकाओं को संबोधित करते हुए केंद्रीय प्रशिक्षक आचार्य कल्याण मित्रानंद अवधूत ने कहा कि धर्म मानव जीवन की एक मूल्यवान संपदा है।
धर्म मनुष्य को मुकुट मणि के रूप में प्रतिष्ठित करता है। धर्म के बिना सृष्टि के मर्म को समझना दुरूह कार्य है। धर्म भाव में प्रतिष्ठित करना धर्मशास्त्र का उद्देश्य है। मनुष्य की अंतः स्थल में प्रसुप्त धर्म बोध को सहज तौर पर जगाने के लिए आध्यात्मिक साधना करना अत्यावश्यक है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन यह जैव धर्म है। भागवत धर्म (मानव धर्म) का तात्पर्य है धृति, क्षमा, दमो, अस्तेय, शौच, इंद्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध जैसे लक्षणों को जागृत करना। आचार्य जी ने कहा कि धर्मशास्त्र को गंभीर सत्य में प्रतिष्ठित होना होगा। धर्म भाव में प्रतिष्ठित करना ही धर्म शास्त्र का उद्देश्य है। भक्त भेदभाव की भावना से सदैव दूर रहता है। ईश्वर को पाने के लिए वैराग्य की जरूरत है। पुरुष को पाने के लिए निस्वार्थ प्रेम का होना अति अनिवार्य तत्व है। ज्ञान कर्म और भक्ति के सुंदर समन्वय से ही आत्म साक्षात्कार संभव है। साधक को हर प्रकार की संकीर्णता, हीन मान्यता के विरुद्ध सोच विचार कर संग्राम करना ही होगा। जातिभेद से ऊपर उठना साधक के लिए प्रारंभिक कार्य है। निराकार ब्रह्म ही जीव का ध्येय है। रागात्मिका भक्ति सभी भक्ति से श्रेष्ठकर है।

प्रवचन कार्यक्रम के बाद सामूहिक समाज सेवा के अंतर्गत फ्री चिकित्सा शिविर का आयोजन भी किया गया। इसमें पूर्णिया की डॉ ब्यूटी रूबी ने अपनी सेवा लोगों को प्रदान की। जो समाज के लिए प्रेरणा है। ब्रह्म मुहूर्त में गुरु सकाश, पाञ्चजन्य, योगाभ्यास एवं सामूहिक साधना का आयोजन किया गया। अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र बाबा नाम केवलम् का गायन किया गया। आचार्य गोविंदानंद अवधूत, महिला सन्यासिनी अवधूतिका आनंद लीना आचार्या, अवधूतिका आनंद कल्याणमया आचार्या, जनरल भुक्ति प्रधान एवं गणेश लाल, कमलेश्वरी, शम्भू शरण, गौतम, रमण, अरुण, ललित, अभिषेक, राम कुमार, जनार्दन, दीपेश के साथ अन्य सदस्यों की कार्यक्रम में अहम भूमिका रही।

सेमिनार को संबोधित करते आचार्य कल्याण।
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