जिसने स्वयं काे मुखाैटे में छिपाया, वह कभी नहीं पा सकेगा सत्य

Purnia News - असत्य कभी अकेला नहीं आता, अपने साथ अहंकार, लालच भी लाता है संस्कृति के बाजार में सुंदर मुखाैटे हमेशा ही सस्ते...

Jan 24, 2020, 09:51 AM IST
Vaisa News - one who hides himself in the face will never be able to find the truth

असत्य कभी अकेला नहीं आता, अपने साथ अहंकार, लालच भी लाता है

संस्कृति के बाजार में सुंदर मुखाैटे हमेशा ही सस्ते दामाें पर मिलते रहे हैं। लेकिन स्मरण रहे कि साैदा ऊपर से सस्ता है, अंतत: वही सबसे महंगा साैदा सिद्ध हाेता है, क्याेंकि जाे व्यक्ति मुखाैटे में स्वयं काे छिपाता है, वह स्वयं से और सत्य से निरंतर दूर हाेता जाता है। सत्य के और उसके बीच एक अलंघ्य खाई निर्मित हाे जाती है, क्याेंकि उसकी आत्मा स्वयं के अनावरण के भय से ही सदा त्रस्त रहने लगती है। वह फिर स्वयं काे छिपाता ही चला जाता है। वस्त्राें के ऊपर वस्त्र और मुखाैटाें के ऊपर मुखाैटे। असत्य अकेला नहीं आता है। उसकी सुरक्षा के लिए उसकी फाैजें भी आती हैं। असत्य और भय का फिर एेसा जाल बन जाता है कि उसके ऊपर आंखें उठाना भी असंभव हाे जाता है। व्यक्ति जब स्वयं के ही मुखाैटाें के उठ जाने के भय से पीड़ित हाे, ताे वह सत्य के पात्र काे उघारने का सामर्थ्य कहां से जुटा सकता है। वह शक्ति ताे स्वयं काे उघारने के साहस से ही अर्जित की जा सकती है। सत्य-साक्षात के लिए भयभीत चित्त ताे शत्रु है। उस दिशा में काैन मित्र है? अभय मित्र है। चित्त की अभयता उसे ही प्राप्त हाेती है, जाे स्वयं के यथार्थ काे स्वयं ही सब भांति उघार कर भय से मुक्त हाे जाता है। स्वयं काे ढकने से भय बढ़ता जाता है और आत्मा शक्तिहीन हाेती जाती है, किंतु स्वयं काे उघाराे और देखाे ताे उस ज्ञान के प्रकाश में ही भय तिराेहित हाे जाते हैं और शक्ति के अभिनव और अमित स्राेताें की उपलब्धि हाेती है। इसे ही मैं साहस कहता हूं-स्वयं काे उघारने और जानने की क्षमता ही साहस है। सत्य की उपलब्धि के लिए यह अनिवार्य है। ब्रह्म की दिशा में यही पहला चरण है।

ओशो

सत्य की खाेज में सर्वाधिक आवश्यक क्या है? उत्तर है-साहस। स्वयं के यथार्थ काे जानने का साहस। मैं जैसा हूं, वैसा ही स्वयं काे जानना सर्वाधिक आवश्यक है। यह बहुत कठिन है। लेकिन इसके बिना सत्य में काेई गति भी संभव नहीं है। स्वयं काे निर्वस्त्र और नग्न जानने से ज्यादा बड़ा तप और क्या है? लेकिन सत्य की उपलब्धि के लिए वही मूल्य चुकाना हाेता है। उससे ही व्यक्ति की सत्य के प्रति अभीप्सा की घाेषणा हाेती है। स्वयं के प्रति सच्चाई ही ताे सत्य के प्रति प्यास की प्रगाढ़ता की अभिव्यक्ति है। असत्य के तट से जाे स्वयं काे बांधे हुए हैं, वह अपनी नाैका सत्य के सागर में कैसे ले जा सकेगा? असत्य के तट काे ताे छाेड़ना ही हाेगा। वह तट ही ताे सत्य की यात्रा के लिए बाधा है। वह तट ही ताे बंधन है। निश्चय ही उस तट में सुरक्षा है। सुरक्षा की अति चाह ही ताे असत्य का गढ़ है। सत्य की यात्रा में सुरक्षा का माेह नहीं, वरन अज्ञात काे जानने का अदम्य साहस चाहिए। असुरक्षित हाेने का जिसमें साहस नहीं है, वह अज्ञात का खाेजी भी नहीं हाे सकता। असुरक्षित हाेने की चुनाैती काे स्वीकार किए बिना काेई न ताे अपने ओढ़े हुए रूपाें काे ही उतार सकता है और न ही उन मुखाैटाें से मुक्त हाे सकता है, जाे सुरक्षा के लिए उसने पहन रखे हैं। क्या सुरक्षा के निमित्त ही, हम जाे नहीं हैं, वही बने हुए हैं? क्या हमारी सारी वंचनाएं सुरक्षा की ही आयाेजन नहीं हैं? यह हमारी सारी सभ्यता-संस्कृति क्या है? अहंकारी विनयी बना है। लाेभी त्यागी बना है। शाेषक दान करता है। हिंसक ने अहिंसक के वस्त्र पहन रखे हैं। और घृणा से भरे हुए चित्त प्रेम की भाषा बाेल रहे हैं। यह आत्म वंचना बहुत सुगम भी है। नाटकाें में अभिनय कब कठिन रहे हैं।

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