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‘श्याम मोरे मित थारो संग खेलूंगी होली’ व ‘रंगीलों फाग आ गयो

एक वर्ष पहले
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शहर के शंकर चौक मंदिर परिसर में प्रत्येक साल की तरह इस साल भी मारवाड़ी समाज की अगुवाई में सोमवार की रात होलिका दहन हाेगा। शंकर चौक मंदिर परिसर में विधि-विधान के साथ 8 बजे गाय का गोबर से निर्मित उपले में आग लगाकर होली दहन किया जाएगा । आम तौर पर दो दिनाें तक मनाए जाने वाले होली पर्व काे मारवाड़ी समाज एक महीने तक मनाते हैं। बसंत पंचमी से पर्व शुरू होकर होलिका दहन के साथ संपन्न हो जाता है। इसके पूर्व लगातार घरों में होलिका पूजन व अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

होलिका दहन में भक्त प्रहलाद के साथ श्याम पूजा : होलिका दहन के दिन एक ओर आम लोग जहां होलिका दहन कर उसकी परिक्रमा करते हैं तो वहीं मारवाड़ी समाज के लोग होलिका दहन के समय केले के पेड़ में हल्दी की गांठ, कच्चा सूत, गेहूं की बाली व चना का झाड़ बांध कर उसकी पूजा अर्चना करते हैं। केले के पेड़ को भक्त प्रह्लाद का प्रतीक मान कर लोग उसकी पूजा के साथ भगवान श्याम की आराधना करते हैं। दहन के समय केले के पेड़ को होलिका में नहीं डाला जाता है। इसीलिए बरकुला यानी गाय के गोबर से निर्मित उपले का प्रयोग किया जाता है।

होलिका दहन के समय मारवाड़ी
समाज के लोग ‘श्याम मोरे मित थारो संग खेलूंगी होली’ आदि भजन गाते हैं। भजन-कीर्तन के दौरान ‘रंगीलों फाग आ गयो श्याम तू भर दे भक्तों की झोली आदि गीतों पर लोग खूब झूमते हैं और एक-दूसरे को होली की बधाई देते हैं।

होलिका स्थल पर रेड़ का पेड़ लगा की जाती है पूजा

मारवाड़ी समाज से जुड़ी सुषमा दहलान, सरिता दहलान कहती हैं कि हमारे समाज में बसंत पंचमी के दिन होलिका स्थल पर रेड़ का पेड़ लगाकर पूजन के साथ होली पर्व मनाने की शुरुआत करते हैं। होली से एक दिन पूर्व होलिका यानी अगजा की पूजा होती है। इसके साथ भगवान श्याम की आराधना भक्तों द्वारा किए जाने की परंपरा है। मारवाड़ी समाज के लोग होलिका दहन के दिन जिस तसले में बरकुला लेकर जाते हैं, होलिका दहन के बाद उसी तसले में आग भरकर घर पहुंचते हैं।

बरकूला के पास महिलाएं।
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