संयमित जीवन जीयें और और अहंकार से दूर रहें
मानव को हमेशा संयमित जीवन जीने व अहंकार से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। मानव जीवन मे हुई छोटी सी भूल भी कभी भयावह परिणाम का कारण बन जाता है। चाहे वह ऋषि, महर्षि देवता या फिर भगवान का ही वंशज क्यों न हो। पथ भ्रष्ट होने व अधर्म को अपनाने वाले भगवान कृष्ण के वंशज को महर्षि नारद के शाप से विनाश के गर्त में जाना पड़ा। उक्त उपदेश स्थानीय बाजार पर श्रीमद्भागवत कथा सह ज्ञान महायज्ञ के प्रथम दिन श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के शिष्य श्री जीयर स्वामी जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। स्वामी जी ने कहा कि अहंकार में राजा नृग से हुई छोटी सी भूल ही उनके पतन का कारक बना और उन्हें गिरगिट योनि में जाना पड़ गया था। उनके पास धन, पद, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य का क्या कहना, जहां कुबेर और देव राज इंद्र भी खुद को बौना महसूस करते थे। लेकिन संस्कृति, संस्कार व मर्यादा नही होने की सजा उन्हें भी भुगतना पड़ा। जिस परिवार में धन, बल, पद - प्रतिष्ठा व ऐश्वर्य हो व संस्कार नहीं हो तो उसे विनाश के गर्त में जाना निश्चित है।
प्रवचन सुनते भक्त।
अमंगलकारी आचरण कभी नहीं करना चाहिए
स्वामी जी ने भागवत महापुराण के एक श्लोक की व्याख्या करते कहा कि अनीति, अन्याय व अधर्म को बढ़ावा देने वाले समाज व परिवार में असामयिक मरण व दुर्भिक्ष की स्थिति बन जाती है व उस परिवार के सदस्य एक अज्ञात भय से ग्रसित रहते हैं। स्वामी जी ने कहा कि जीवन मे जो कार्य अमंगलकारी व पीड़ा पहुंचने वाला लगे वह आचरण दूसरों के साथ नहीं करना ही धर्म है। बैकुंठ नाथ स्वामी ने सफल मानव जीवन के लिए आदर्शों को अपनाएं।