सासाराम में पहाड़ व पानी सबसे बड़ा मुद्दा, चुनाव में इनकी चर्चा तक नहीं हुई

Sasaram News - बालाकोट हमले और भाजपा के राष्ट्रवाद के नारे बनाम गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक के लिए कांग्रेस के चुनावी हथियार...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 09:21 AM IST
Sasaram News - mountains and water are the biggest issues in sasaram they have not been discussed in elections
बालाकोट हमले और भाजपा के राष्ट्रवाद के नारे बनाम गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक के लिए कांग्रेस के चुनावी हथियार न्याय पर सासाराम के लोगों के बीच पानी और बंद पड़े पत्थर उद्याेग का मुद्दा भारी है। यहां के लोगों से बात कीजिए तो पता चलता है कि गावों में सबसे बड़ा मुद्दा पानी और पहाड़ के कारण उत्पन्न बदहाली है। सासाराम से दक्षिण कई प्रखंडों में किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता। जिससे हजारों एकड़ भूमि बंजर ही रह जाती है। सासाराम के किसानों के लिए कदवन जलाशय परियोजना एक बड़ी उम्मीद है। जिसे अगर शुरू कर दिया गया तो लगभग 8000 एकड़ बंजर भूमि को सिंचित बनाया जा सकता है। लेकिन यह परियोजना भी बाकी राजनीतिक मुद्दों की तरह सियासत का विषय बना हुआ है। सिकरीया निवासी प्रमोद सिंह, धनकाढ़ा के सुमन कुमार, कामेश्वर सिंह आदि किसानों की मानें तो जब-जब चुनाव आता है क्षेत्र के जन प्रतिनिधि इस योजना को पूरा करने का वादा कर जाते है। चुनाव जीतने के बाद 5 साल तक किसी ने किसानों की सुध नहीं ली। 2014 के चुनाव में परिवर्तन की लहर में तात्कालिक कांग्रेस सांसद मीरा कुमार को किसानों के नाराजगी का समाना करना पड़ा था। चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी छेदी पासवान को जीत मिली। लोगों नए सांसद से काफी उम्मीदें थी, देखते ही देखते 5 साल बीत गया। लेकिन जनता की समस्या ज्यों की त्यों धरी की धरी रह गई। किसान इसे चुनाव में एक मुद्दे के रूप में देख रहे हैं।

बंद पड़ा पत्थर उद्योग।

स्थानीय समस्याओं की बात तक नहीं कर रहे प्रत्याशी

सासाराम संसदीय क्षेत्र में एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधी टक्कर है। राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं और नेताओं से बात कीजिए तो वो तोते की तरह अपनी अपनी पार्टी के नारे और मुद्दे रटते हैं। एनडीए वाले अगर आतंकवाद पर प्रहार, राष्ट्रवाद और नरेंद्र मोदी की छवि को सबसे बड़ा मुद्दा बताते हैं तो महागठबंधन वाले बेरोजगारी, नोटबंदी और जीएसटी की मार और कांग्रेस की न्याय योजना की चर्चा करते हैं। लेकिन आम लोगों से बात कीजिए तो वो इन सबसे अलग अपनी स्थानीय समस्याओं और रोजमर्रा की जिंदगी की दिक्कतों को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं।

प्यास बुझाने की जद्दोजहद से कैमूर पहाड़ी पर बसे गांवों के लोगों को कब मिलेगी मुक्ति?

सासाराम संसदीय क्षेत्र के सासाराम व चेनारी विधान सभा क्षेत्र के गांवों में पेय जल की घोर संकट है। कैमूर पहाड़ी पर बसे नौहट्टा और रोहतास प्रखंड के कई गांवों के लोगों को गर्मी के मौसम में 5 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। पहाड़ी पर बसे दर्जनों गांवों में मार्च के अंत तक जल लोगों के पहुंच से काफी नीचे पहुंच जाता है। नौहट्‌टा, रोहतास, सासाराम, तिलौथु, चेनारी, शिवसागर प्रखंडों में प्यास बुझाने के लिए ग्रामीणों को प्रति दिन जद्दोजहद करनी पड़ रही है। वहीं शिवसागर व चेनारी प्रखंडों में कई गांव एेसे है जहां के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक पाई गई है। दो दर्जन से अधिक गांवों के लोग सालों भर दूषित पानी पीने को विवश है। यह समस्या लम्बे समय से है लेकिन इसका निदान करने का प्रयास आज तक किसी किसी जन प्रतिनिधि ने नहीं किया। जिसका नतीजा है कि पानी के सवाल पर सासाराम के जन-जन में आक्रोश है। पानी के लिए बेहाल लोग इन दिनों वोट मांगने पहुंच रहे प्रत्याशियों से सिर्फ यहीं सवाल पूछते है कि प्यास बुझाने की जद्दोजहद से उन्हें मुक्ति कब मिलेगी?

बंद पड़े पत्थर उद्योग से 50 हजार से अधिक मजदूरों की छिन चुकी है रोजी-रोटी

2012 में राज्य सरकार ने पर्यावरण नियमों का हवाला देते हुए सासाराम के पत्थर उद्योग को बंद करा दिया। जिससे 500 लोगों का व्यवसाय साथ ही 50 हज़ार से अधिक मजदूरों के हाथों से रोजी-रोटी छिन छिन ली गई। इस व्यवसाय में 20 वर्षों तक अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा अर्पित कर देने वाले लोग अब भुखमरी के शिकार है। पत्थर उद्याेग से जुड़े मजदूरो और व्यवसायियों के लिए बंद पत्थर उद्याेग का पून: स्थपित करना रोजी-रोटी का प्रबंध करना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है। जन संपर्क के लिए उनके दरवाजे तक पहुंच रहे सांसद प्रत्याशियों के सामने अपने इस मुद्दे को रख रहे है। मामले को ले लोगों में एनडीए सरकार के प्रति नाराजगी का आलम है। पत्थर उद्योग से जुड़े स्थानीय गांवों निवासी अखिलेश चौधरी, कमल गुप्ता, राजेश सेनकर, मुरारी कुमार, सहित अन्य लोगों का कहना है सांसद छेदी पासवान ने भी हमारी मांगों पर पहल नहीं किया। बिहार में एनडीए की सरकार है सांसद भी एनडीए सरकार के सहयोगी भाजपा से आते है। इनके द्वारा अगर प्रयास किया गया होता तो शायद पत्थार उद्योग पुन: स्थापित हो जाता।

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