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ग्रामीणों को नहीं मिला वन पदार्थों को खरीद बिक्री करने का अधिकार

एक वर्ष पहले
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6 अप्रैल 2018 को चौपाल कार्यक्रम में सीएम ने किया था घोषणा

राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के घोषणा के एक वर्ष बाद भी कैमूर पहाड़ी के ऊपर बसे गांवो के ग्रामीणों को नहीं मिल सका। वन पदार्थ चुन कर इकट्ठा करने और खरीद बिक्री करने का अधिकार । उलेखनीय है कि 6 अप्रैल 2018 को सीएम नौहट्टा प्रखण्ड के उग्रवाद प्रभावित पिपराडीह पंचायत के रेहल गांव में चौपाल कार्यक्रम में उपस्थित ग्रामीणों को संबोधित करते हुए घोषणा किये थे कि वन पदार्थों जैसे हरे, बहेरा, तेन, पीयर, महुआ पर वनवासियों का अधिकार होगा। सीएम ने चौपाल में उपस्थित राज्य के वरीय पदाधिकारियों को निर्देश दिया था कि वन पदार्थो को इकट्ठा करने व खरीद बिक्री करने में वनवासियों को कोई परेशानी नहीं हो इसके लिए आवश्यक हो तो राज्य के कानून में संशोधन कीजिए। ताकि वनवासियों को कोई परेशानी नही हो। वनवासी आसानी से वन पदार्थो को इकठ्ठा कर बेच सके और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। सीएम के घोषणा का आज एक डेढ वर्ष बीत गया,, परन्तु न तो वन कानून में कोई संशोधन हुआ नहीं वनवासियों को वन पदार्थ इकट्ठा करने व खरीद बिक्री करने का अधिकार मिला। चौपाल कार्य क्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि पहाड़ी गांव में बसे 30 हजार लोगों का विकास करना हमारा कर्तब्य है। उलेखनीय है कि कैमुर पहाड़ी के ऊपर बसे गांवो में आजादी के 72 वर्ष बाद भी विकास की किरण नही पहुँच सका है। पिपराडीह एवम रोहतास गढ़ इन दोनों पंचायत के 11 राजस्व ग्राम व 83 टोले की लगभग 30 हजार की आबादी में विकास की उम्मीद की जग गयी थी। पहाड़ी क्षेत्र के गांवो का बारी बारी से विकास होगा। उनके भी गांव की तस्वीर बदलेगी। लेकिन सीएम घोषणा के एक वर्ष बाद भी पहाड़ी गांव के लोगों को सड़क शिक्षा चिकित्सा, बिजली, सिंचाई यातायात की बुनियादी सुविधा भी नहीं मिल सका।

कहते हैं ग्रामीण

कैमूर पहाड़ी के ऊपर बसे बुधुआ गांव के राम लाल यादव, सुदामा यादव, पटेल साव, हसड़ी गांव के राजेश यादव, रोहतासगढ़ पंचायत के पूर्व मुखिया कृष्णा यादव ने कहा कि सरकार हमलोगों को बिजली, सड़क, सिंचाई यातायात, स्वास्थ्य शिक्षा के मूल भूत सुविधा पहाड़ी गांव में उपलब्ध करा दे फिर देखिएगा पहाड़ी के किसान मजदूर पथरीली जमीन में सोना पैदा कर के दिखाएंगे। पहाड़ी गांव के बंजर भूमि पर परिश्रम कर के सोना पैदा होगा।

पहाड़ी गांवों के लोग निराश है

पहाड़ी गांवो के लोगों मे ं वनपदार्थो वनोपजो पर मिलने वाले अधिकार को लेकर था। जिससे पहाड़ी गांवो के लोगों का जीविकोपार्जन होता है। उलेखनीय है कि सिचाई संसाधन विहीन पहाड़ी गांवो के किसानों की खेती हर वर्ष सुख जाती है। यहां के लोगो का आजीविका का मुख्य साधन पशुपालन और वनोपज ही है। पहाड़ी गांव में रहने वाले 90 प्रतिशत लोगों के परिवार का भरण पोषण महुआ, तेन, पियार, हरे, भरे, आंवला आदि फल फूल चुनकर और उसे बेचकर मुगल काल और अंग्रेजो के शासन काल मे भी चलता था।

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