हाथियों को रोकने के लिए ट्रेंच फेंसिंग का प्रस्ताव फाइलों में फांक रही धूल

3 वर्ष पहले
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कोसी योजना के स्थापना से पूर्व नेपाल से सटा यह इलाका भी जंगली था। जहां हाथियों के आने-जाने का सिलसिला लगा रहता था। वर्ष 2008 के पूर्व यह सिलसिला थोड़ा कम था। इस क्षेत्र में वर्ष 2008 से पहले कभी-कभार ही प्रवेश करते थे। लेकिन वर्ष 2008 के कुसहा त्रासदी के बाद हाथियों का इस क्षेत्र में आना बढ़ गया है। वन विभाग एवं स्थानीय प्रशासन की जितनी भी कोशिश बीते 11 वर्षों में हुई, सब बेकार ही साबित हुई।

हाथी एवं उसके झुंड का निरंतर पूर्व की तरह ही आना जारी रहा। जिस दौरान जान-माल एवं फसलों का नुकसान भी होता रहा। लेकिन बीते 11 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ, जब हाथी भारतीय प्रभाग में 40 किलोमीटर अंदर तक पहुंच गया और 5 लोगों की जान ले ली और लोगों को घायल कर दिया। पटना से हाथी पकड़ने आई रेस्क्यू टीम बुधवार को ही क्षेत्र में पहुंच चुकी है। वहीं भागलपुर एवं पूर्णिया से भी वन अधिकारी हाथी को कब्जे में करने के लिए पहुंचकर मशक्कत कर रहे हैं।

भवानीपुर के एक खेत में हाथी।

वन विभाग द्वारा इंडो नेपाल पदाधिकारी की संयुक्त बैठकों में हाथी के प्रवेश का मामला पूर्व में उठ चुका है। जिसमें नेपाल के अधिकारी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह भारत के असम के जंगलों के ही हाथी हैं, जो अस्थायी रूप से नेपाल के मृगवन में डेरा जमाए हुए हैं। जबकि भारतीय वन पदाधिकारी का कहना है कि यह नेपाल के वन विभाग का हाथी है। मंगलवार एवं बुधवार को जिस हाथी ने भारतीय सीमा में 40 किलोमीटर तक प्रवेश कर उपद्रव मचाया और कई लोगों की जान ली। उस हाथी के गले में भी घंटे बंधे हैं। जिससे स्पष्ट है कि यह हाथी नेपाल वन विभाग का पालतू है। इन हाथियों के भारतीय सीमा में प्रवेश को रोकने के लिए वन विभाग द्वारा भारत सरकार को सीमा पर टेंच फेंसिंग अथवा नेपाल के मृगवन में इलेक्ट्रिक फैंसिंग लगाने का प्रस्ताव दिया जा चुका है। ट्रेंच फेंसिंग का प्रस्ताव अभी तक फाइल में धूल चाट रहा है। जबकि मृगवन में एक साल के लिए इलेक्ट्रिक फेंसिंग लगाया गया तो हाथियों के आने की रफ्तार कम हुई। लेकिन बीते वर्ष इलेक्ट्रिक फेंसिंग को हटा लिया गया। जिसके बाद हाथियों का आना एवं उपद्रव करना जारी है। हाथियों को भगाने के लिए रोशनी, आग आदि जलाकर हाथी को भगाने का प्रयास किया जाता है जिससे वह और उग्र हो जाते हैं और उत्पात मचाते हैं।

वीरपुर में गजराज को नेपाल प्रभाग की ओर से खदेड़ते अधिकारी व ग्रामीणों की भीड़।

ट्रेंकुलाइजर का इस्तेमाल करने के लिए एक्सपर्ट की जरूरत
हाथी को रोकने के लिए जंगली इलाकों में ट्रेंकुलाइजर का प्रयोग होता है, लेकिन वन क्षेत्र पदाधिकारी वीरपुर सुरेश गुप्ता कहते हैं कि इसके लिए एक्सपर्ट लोगों की जरूरत है। इस परिस्थिति में यह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि स्थिति वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। बताया कि स्थायी समाधान के लिए वरीय अधिकारी स्तर पर ही निर्णय लिया जा सकता है।

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