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रोंगटे खड़े कर देती है स्पीलबर्ग की शिंडलर्स लिस्ट, लाइफ इज ब्यूटीफुल में नजर आता है पिता का संघर्ष

7 महीने पहले
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  • अत्याचार, अमानवीयता और पीड़ा पर बनी ऐसी फिल्मों को कई अवॉर्ड मिले
  • भारत में अब तक डिटेंशन सेंटर को लेकर कोई बड़ी फिल्म नहीं बनी
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हॉलीवुड डेस्क. भारत में डिंटेशन सेंटर को लेकर बहस चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि डिटेंशन सेंटर बनाए जाने की खबरें अफवाह हैं। इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने सेंटर बनाए जाने पर सफाई दी। दरअसल, इमिग्रेशन कैम्प या डिंटेशन सेंटर वह जगह होती है, जहां वीजा उल्लंघन, अवैध प्रवेश या अनधिकृत तरीकों से देश में आने वाले लोगों को रखा जाता है। हॉलीवुड में कुछ मशहूर फिल्में बनी हैं जिन्होंने डिटेंशन सेंटर की हकीकत को पर्दे पर गंभीरता से दिखाया गया है। दूसरी ओर, बॉलीवुड में अब तक इस मुद्दे पर कोई फिल्म नहीं बनी।

सबसे ज्यादा बात होती है 16 साल पहले आई 'शिंडलर्स लिस्ट' की
डिंटेशन सेंटर्स की बहस में सबसे पहले नाजी कैम्प और स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म 'शिंडलर्स लिस्ट' याद आती है। 1993 में रिलीज हुई 'शिंडलर्स लिस्ट' ने 7 कैटेगरी में ऑस्कर अवॉर्ड प्राप्त किए थे और इसे स्पीलबर्ग की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कहा जाता है। कलर फिल्मों के दौर में ऑस्कर जीतने वाली यह पहली ब्लैक एंड व्हाईट फिल्म थी। 'सरहद पार सिनेमा'  किताब के लेखक राकेश मित्तल ने फिल्म की समीक्षा करते हुए लिखा है कि, 'शिंडलर्स लिस्ट' दूसरे विश्व युद्ध और नाजी सेना के अत्याचारों पर बनी सबसे बेहतरीन फिल्म है। इसमें यहूदियों पर हुई क्रूरता को बेहद बारीकी और गंभीरता से दिखाया गया।

फिल्म शिंडलर्स लिस्ट में पौलेंड की ओलिविया डेब्रोवस्का नाम की तीन साल की लड़की ने भी काम किया था। रेड कोट पहने सबसे आगे रहने वाली इस बच्ची ने वादा किया था कि वह 18 साल की होने से पहले यह फिल्म नहीं देखेगी।

यह फिल्म चेकोस्लोवाकिया के एक बिजनेसमैन की वास्तविक कहानी है, जो 1100 पोलिश यहूदियों को अपने कारखाने में काम देकर नाजियों के चंगुल से बचाता है। वह शुरुआत में अपने कारखाने में यहूदियों से बेदर्दी से काम लेता था लेकिन बाद में जब उसने नाजी कैम्प में उन पर भीषण अत्याचार देखे तो उसका मन बदल गया। इसके बाद वह उन्हें बचाने में जुट गया और अपनी जरूरत से ज्यादा लोगों के नाम एक लिस्ट में देकर उन्हें कारखाने में काम के बहाने कैम्प से निकालने लगा। स्पीलबर्ग ने इस फिल्म की शूटिंग पोलैंड के उसी यहूदी शहर क्रेको की उन जगहों पर की जहां यहूदियों को यातनाएं दी गईं थीं।    इस फिल्म को 12 श्रेणियों में ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया था, जिनमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म और निर्देशक सहित सात श्रेणियों में इसे पुरस्कृत किया गया। फिल्म ने लागत से 15 गुना ज्यादा कमाई की और इसे विश्व सिनेमा के इतिहास की महानतम फिल्मों की सूची में रखा गया। दुनिया के लगभग हर फिल्म इंस्टीट्यूट के कोर्स में शामिल की गई है।

1) 10 फिल्मों में डिटेंशन का दर्द

रिलीज वर्ष : 1997
साल 1997 में रिलीज हुई 'लाइफ इस ब्यूटिफुल' विश्व युद्ध 2 के दौरान जर्मन फोर्स से पीड़ित परिवार की कहानी है। फिल्म में एक यहूदी-इटालियन वेटर और उसके छोटे बेटे को कॉन्सनट्रेशन कैंप भेज दिया जाता है। इसके बाद पिता अपने बेटे को यह यकीन दिलाता है कि यह एक खेल चल रहा है और इसे जीतने पर ईनाम मिलेगा। फिल्म का निर्देशन ऑस्कर विजेता एक्टर रॉबर्टो बेनिग्नी ने किया है। रॉबर्टो इस फिल्म में मुख्य भूमिका में भी हैं। फिल्म ने तीन ऑस्कर समेत 67 पुरस्कार अपने नाम किए थे।

रिलीज वर्ष : 2002
रोमन पोलांस्कि निर्देशित यह फिल्म 'द पियानिस्ट..' आत्मकथा से प्रेरित है। यह कहानी है एक पियानोवादक व्लादिस्लॉ की जो युद्ध के कारण अपने परिवार से अलग हो जाता है। उसके परिवार को जर्मनों द्वारा कॉन्सट्रेशन कैंप भेज दिया जाता है, वहीं उसे जर्मन लेबर कंपाउड ले जाया जाता है। इसी दौरान वो वहां से भाग जाता है और एक यहूदी रिफ्यूजी के तौर पर युद्ध का गवाह बनता है। फिल्म ने बेस्ट एक्टर, डायरेक्टर और राइटिंग, स्क्रीनप्ले कैटेगरी में ऑस्कर अवॉर्ड जीते थे। 

रिलीज वर्ष: 2008
यह कहानी है एक ऐसे बच्चे की जिसके पिता वर्ल्ड वॉर 2 के दौरान डिंटेंशन सेंटर में कमांडर हैं, लेकिन उस बच्चे की दोस्ती सेंटर में लाए गए एक हमउम्र यहूदी लड़के से हो जाती है। इसके बाद दोनों की यहूदी बच्चे के पिता को खोजने के दौरान गैस चेंबर मौत हो जाती है। फिल्म का निर्देशन मार्क हरमन ने किया है, जबकि डेविड थ्युलिस, रूपर्ट फ्रेंड मुख्य भूमिका में हैं।

रिलीज वर्ष: 2015
फिल्म में एक ऐसे कैदी सउल की कहानी है जिसका काम कॉन्सट्रेशन कैंप में गैस चैंबर से लाशें निकालना है। इसी क्रम में एक दिन उसे एक ऐसा बच्चा मिलता है जो चैंबर में बच गया, लेकिन बेहोश है। उस बच्चे की मौत के बाद साउल पूरी रस्मों के साथ उस बच्चे को दफनाने की मांग करता है, लेकिन उसकी मांग को अधिकारियों द्वारा खारिज कर दिया जाता है। ऐसे में वो लाश चुराकर उसे नियमों के साथ दफनाने के प्रयास करता है। फिल्म का निर्देशन लाजलो नीमस ने किया था। फिल्म ने एक ऑस्कर समेत 60 अन्य पुरस्कार अपने नाम किए थे।

रिलीज वर्ष : 2007
कहा जाता है कि द काउंटरफाइटर इतिहास की सबसे बड़ी जालसाजी ऑपरेशन की सच्ची कहानी है। फिल्म के अनुसार जालसाज सालमन नाम का व्यक्ति नाजी युग में अपनी मस्ती में जीता है, लेकिन उसे एक जर्मन सुप्रीटेंडेंट द्वारा गिरफ्तार कर कैंप में डाल लिया जाता है। अपनी खूबी के कारण उसे दूसरे कैंप में भेजते हैं, जहां उसे जर्मनी के दुश्मन देशों की करंसी को कमजोर करने के लिए एक मिशन में लगाया जाता है। स्टीफन रुजोविज्की निर्देशित इस फिल्म ने एक ऑस्कर अवॉर्ड अपने नाम किया था।

रिलीज वर्ष: 2015
फिल्म की कहानी के अनुसार नाजी कैंप में बंदियों को एक सूटकेस में यहूदी बच्चा मिलता है। सभी बंदी उसे बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, लेकिन अंत में बच्चे के बारे में खुलासा हो जाता है। इसके बाद सभी कैदी जर्मन सैनिकों की बर्बरता का शिकार होते हैं। फिल्म का निर्देशन फिलिप कैडलबैश ने किया था। वहीं फ्लोरियन स्टेटर और पीटर श्नाइडर ने अहम भूमिका निभाई थी।

रिलीज वर्ष: 1997
फिल्म में मैक्स नामक एक समलैंगिक बंदी की कहनी को दिखाया गया है, जो अपनी असलियत से इनकार करता है। ताकि वे सैनिकों की क्रूरता से बच सके। कहानी के अनुसार जब उसे कंसन्ट्रेशन कैंप लाया जाता है तो उसे एक ऐसे साथी बंदी से प्यार हो जाता है जो गर्व के साथ समलैंगिक होना स्वीकार करता है। सीन मैथियास निर्देशित फिल्म ने कांस फिल्म फेस्टिवल में फॉरेन फिल्म का खिताब जीता था।

रिलीज वर्ष: 1975
जैम्स कॉलियर निर्देशित फिल्म दूसरे विश्व युद्ध के समय की कहानी है। फिल्म में दो बहनों हैं जिन्हें यहूदियों को छिपाने और नियमों को तोड़ने के संदेह में, कैंप में भेजा जाता है, जहां उनका ईसाई विश्वास उन्हें निराशा और कड़वाहट से बचाता है। फिल्म ने एक गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड जीतने में सफलता हासिल की थी।

रिलीज वर्ष: 1960
यह एक ऐसी लड़की की कहनी है जिसे पूरे परिवार के साथ कॉनसन्ट्रेशन कैंप में भेज दिया जाता है। कैंप में वह एक यहूदी डॉक्टर की मदद से एक मृत जर्मन महिला की जाली आईडी हासिल कर लेती है और जर्मन बन जाती है। फिल्म को बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगिरी में ऑस्कर अवॉर्ड नॉमिनेशन मिला था। 

रिलीज वर्ष: 1987
यह कहानी है जर्मन शिविर से बड़े समूह में बंदियों के भागने की। दूसरे विश्व युद्ध के समय जब नाजीवाद अपने चरम पर था तो सोबिबोर कैंप में कैदी भागने की कोशिश करते हैं। कहानी के अनुसार शुरुआत कुछ कैदियों से होती है, लेकिन बाद में सभी 600 बंदी भागने की योजना बनाते हैं। दो गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म का निर्देशन जैक गोल्ड ने किया था।

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