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राज कपूर: आज़ाद भारत का पहला ‘आवारा’

हमारे देश को आज़ादी मिले अभी केवल दो वर्ष गुज़रे थे, जब अभिनेता-निर्देशक राज कपूर को फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी की बदौलत जश

Dainik Bhaskar

Dec 15, 2017, 11:34 AM IST
The Late Actor Was Born On December 14

मुंबई। हमारे देश को आज़ादी मिले अभी केवल दो वर्ष गुज़रे थे, जब अभिनेता-निर्देशक राज कपूर को फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी की बदौलत जश्न मनाने का भरपूर बहाना मिल गया था! इसके बावजूद नए-नए स्वतंत्र हुए देश में सामाजिक अव्यवस्था से दुखी राज अब जनता को मनोरंजन देने के साथ ही सीधे उनके दिलों में उतरने को बेकरार थे। आपको बता दें कि राज के एक्टिंग करियर का आरंभिक हिस्सा चार्ली चैपलिन के ट्रैंप एक्ट के चारों तरफ खड़ा हुआ था...

एक मसखरा, जो सामाजिक आलोचक की भूमिका निभाता चला गया। राज कपूर के सबसे बड़े पुत्र रणधीर कपूर स्वीकारते हैं- ‘चार्ली साहब से पापा कई बार मिले थे। वे उनसे बहुत प्रभावित भी थे।’

सुप्रसिद्ध थिएटर आर्टिस्ट पृथ्वीराज कपूर के बेटे राज को ‘बरसात’ की जबर्दस्त सफलता ने अपने पैरों पर खड़ा कर दिया था। अब वे न केवल वटवृक्ष रूपी अपने पिता की छाया से बाहर निकलने को आतुर थे, बल्कि उस दौर की फिल्म मेकिंग के अंदाज से भी! आखिर संयोग कुछ ऐसा बना कि 25 वर्षीय राज कपूर जब अलग तरह की पटकथा खोज रहे थे, तभी ख्वाजा अहमद अब्बास को निर्माता की तलाश थी। राज के मंझले बेटे ऋषि कपूर का कहना है- ‘डैड बताया करते थे कि अब्बास साहब ने ‘आवारा’ को महबूब (ख़ान) साहब की खातिर लिखा था। लेकिन कहानी सुनने के बाद महबूब साहब ने इसमें जहां यूसुफ (दिलीप कुमार) साहब को कास्ट करने का मन बना लिया था, वहीं अब्बास साहब थे कि इसके लिए कतई राजी नहीं थे। दरअसल, अब्बास साहब ने पिता-पुत्र के किरदारों के लिए यह कहानी पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर को ही ध्यान में रखकर लिखी थी... दूसरी ओर, महबूब साहब को अपने समकालीन एक्टर यानी मेरे दादा के साथ काम करना गवारा नहीं था।

इस बारे में जब मेरे डैड को पता चला... यह भी कि स्क्रिप्ट पूरी तरह तैयार है, तब उन्होंने ही महबूब साहब को मनाया कि वे इसे बनाने का अधिकार उन्हें सौंप दें। इसका कारण यह भी हो सकता है कि डैड तब फिल्ममेकर के तौर पर अपनी जगह बना रहे थे। बहरहाल, डैड का तीसरा प्रोजेक्ट बनने की गरज से यह कहानी उनकी झोली में आ गई!’ इसका मतलब यह नहीं कि राज कपूर के लिए आगे का रास्ता बिल्कुल आसान हो गया। असल में के. ए. अब्बास और वी. पी. साठे की लिखी ‘आवारा’ के अनुसार, यह राज नाम के एक सड़कछाप गुंडे की कहानी थी। राज के जन्म के बाद उसके अमीर पिता जज रघुनाथ ने उसे छोड़ दिया था।

सो, राज कपूर ने जब अपने पिता पृथ्वीराज से जज रघुनाथ का रोल निभाने का आग्रह किया तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया- ‘मैं फिल्मों में लीड रोल करता हूं... मैंने पिता का रोल नहीं किया है।’ जाहिर है कि हिंदी सिनेमा के ‘पितामह’ तब बहुत बड़े स्टार थे, लिहाजा राज भी मान चले कि वे अपने पापा को यह सबसे अहम किरदार निभाने के लिए मना नहीं पाएंगे। ऐसे में अब्बास साहब खुद ‘पापाजी’ के पास गए और उन्हें बताया- ‘फिल्म के हीरो आप ही हैं, क्योंकि जज रघुनाथ के इर्द-गिर्द घूमने वाली इस कहानी में ‘आवारा’ तो आपका बेटा होगा!’ इसके बाद पृथ्वीराज ने हामी भर दी... और सचमुच, अपने व्यक्तित्व के अनुरूप वे जज के किरदार में दिखे भी असरदार थे!

‘आवारा’ में राज और पृथ्वीराज ही नहीं थे... वे तो पुत्र-पिता की भूमिका में थे ही, स्वयं राज के लाडले रणधीर के अलावा पृथ्वीराज के एक और सुपुत्र शशि भी स्क्रीन पर आए थे! ज़रा याद कीजिए उस सीन को, जिसमें जज बने पापाजी कह रहे हैं- ‘ऑर्डर ऑर्डर ऑर्डर, मुल्जिम राज।’ अब आपको लैंप पोस्ट के नीचे कुत्ते को खाना खिलाता हुआ एक बच्चा दिखेगा... वही रणधीर हैं, जबकि राज कपूर के बचपन का रोल शशि ने निभाया था। रणधीर आगे कहते हैं- ‘ऐसा नहीं है कि मेरे डैड की सभी फिल्में चार्ली के स्टाइल वाली रहीं... ‘अंदाज’ की तरह ‘जागते रहो’ और ‘शारदा’ को अलग रखा जाना चाहिए। लेकिन हां, ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ के दौरान वे चैपलिन से वाकई बहुत प्रभावित नज़र आते हैं।’ कुछ भी हो, हमेशा गैर-पारंपरिक सिनेमाई करिश्मा करने को उत्साहित राज कपूर को आम जनता की नब्ज की अच्छी और बारीक समझ थी... ‘आवारा’ (1951) के चलते वे पहले ऐसे भारतीय सितारा बनकर उभरे, जिसकी धाक स्वदेश से बाहर रूस तक पहुंच गई थी!

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