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शैलेन्द्र: राज की बात मानकर की महान भूल

शैलेन्द्र को यूं ही जनता का गीतकार नहीं कहा जाता...

Danik Bhaskar

Dec 14, 2017, 06:41 PM IST
मुंबई। शैलेन्द्र को यूं ही जनता का गीतकार नहीं कहा जाता... सीधे-सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए वे उन्हीं की भाषा में गीत लिखते थे! ये गीत किसी भी फिल्म में पैबंद की तरह नहीं लगते, बल्कि कहानी को गति प्रदान करने में भी अहम भूमिका निभाते थे। राज कपूर की फिल्म में तो उनका एक गीत ऐसा जरूर होता, जो ‘राजू’ के चरित्र को पर्दे पर उभार कर रख देता था- ‘मेरा जूता है जापानी...’ (श्री 420), ‘सब कुछ सीखा हमने...’ (अनाड़ी), ‘मेरा नाम राजू...’ (जिस देश में गंगा बहती है) आदि। आपको बता दें कि फिल्म इंडस्ट्री में इनकी दोस्ती की कभी दुहाई दी जाती थी, पर राज के रवैये ने शैलेन्द्र को गहरा आघात पहुंचाया तो उन्होंने संसार त्यागने की क्या गज़ब की तिथि मुकर्रर की- 14 दिसंबर... जिस दिन राज कपूर अपना जन्मदिन मनाते थे:
सन् 1960 की बात है, जब ‘बिमल राय प्रोडक्शन’ से अलग होने के उपरांत बासु भट्‌टाचार्य एक छोटी-सी कोठरी में रह रहे थे और सौ वर्ग फीट की यही कोठरी शैलेन्द्र का दूसरा ठिकाना थी। यहां ज़िंदगी गुजारते हुए जो सपना बासु ने देखा, शैलेन्द्र भी कुछ उसी तरह का ख्वाब बुन रहे थे।
असल में फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की कहानी ‘तीसरी कसम’ पढ़ने के बाद दोनों को एक साथ लगा- ‘इस कहानी पर यदि हम फिल्म बनाएं तो कमाल की आर्ट फिल्म बनेगी... दर्शकों को पसंद भी खूब आएगी!’ कहा जाता है कि दो दीवाने मिल-बैठकर यह खयाली पुलाव जब पका रहे थे, तब शैलेन्द्र ने ही पूछा था- ‘बासु दा, यह फिल्म बनाने में कितना खर्च आएगा?’ बासु दा का तजुर्बा देखिए, ‘दो-ढाई लाख में काम चल जाएगा। वैसे भी हमें चोटी के हीरो-हीरोइन तो चाहिए नहीं... तड़क-भड़क भी नहीं दिखाएंगे, इसलिए सेट भी सस्ते और स्वाभाविक लगाएंगे!
अपने सुब्रत मित्रा कैमरा संभाल लेंगे... बस, कच्ची रील का खर्च है।’ बेशक, यह एक लेखक का हिसाब-किताब था... बनिए वाला नहीं, फिर भी शैलेन्द्र उछल पड़े- ‘एक लाख तो मेरे पास है ही, शेष का भी कुछ न कुछ इंतजाम हो जाएगा। लेकिन अभी के लिए क्या हमारी गाड़ी एक लाख में चल निकलेगी?’ ‘क्यों नहीं’- यह सोचे बगैर कि एक लाख रुपए तो महज तीन दिनों की शूटिंग में साफ हो जाता है, उत्साहित बासु दा ने शैलेन्द्र को गले लगा लिया- ‘जरूर चल निकलेगी।’ जब यह बात राज कपूर को पता चली तो वे चौंक गए... सूत्रों की मानें तो वास्तव में उन्हें डर लगा, मगर इसे उन्होंने ‘आर. के.’ स्टूडियो में हो रही बगावत के तौर पर देखा! यह बात और है कि कहानी सुनकर वे मन ही मन खूब आनंदित हुए- ‘ऐसी कहानी में पैसा फंसाने से अच्छा होगा कि इस कहानी को ही अरब सागर में फेंक दिया जाए!’
जाहिर है कि राज कपूर को शैलेन्द्र से कोई ‘खतरा’ नहीं था, सो कहते हैं कि सोची-समझी रणनीति के तहत उन्होंने ही दोस्त के समक्ष मुफ्त में काम करने का प्रस्ताव रख दिया... और इस प्रस्ताव को स्वीकार लेना ही शैलेन्द्र की महान भूल साबित हुई, जिसकी कीमत वे जीवन भर नहीं चुका सके! खैर, शैलेन्द्र भागे-भागे बासु दा के पास पहुंचे और एक सांस में पूरा किस्सा बता दिया। सुना है कि सीधे-सादे ग्रामीण युवक हीरामन की भूमिका में राज को अनफिट समझते हुए भी बासु दा इसलिए राजी हो गए, क्योंकि उन्हें पता था कि राज के नाम से फिल्म चल निकलती है। अब हीरो चोटी का है तो हीरोइन का भी स्तर होना चाहिए, लिहाजा हीराबाई के किरदार के लिए वहीदा रहमान के नाम पर मोहर लग गई। लेकिन यहां बताना जरूरी है कि ‘तीसरी कसम’ में छोटे-छोटे सितारे होते तो वह कब की बनकर तैयार हो जाती, मगर राज कपूर के पास वक्त कहां? वे तो ‘जिस देश...’ का ओवर फ्लो बटोर कर ‘संगम’ का निर्माण करने में व्यस्त हो गए थे। शैलेन्द्र जब भी राज के पास डेट के लिए पहुंचते, एक ही उत्तर मिलता- ‘मैं तो घर का ही आदमी हूं... जब कहो, आ जाऊंगा। बस, ज़रा ‘संगम’ पूरी हो जाए।’
लेकिन इसी ‘घर के आदमी’ की बदौलत ‘तीसरी कसम’ रुकी रही, जबकि ‘संगम’ पूरी करके उसे प्रदर्शित करने की भी तैयारियां होने लगीं। ‘संगम’ रिलीज हो गई तो ‘मेरा नाम जोकर’ की कहानी फाइनल होने लगी, पर राज के टाल-म-टोल से शैलेन्द्र को बेहद नुकसान हो रहा था... पहले-पहल निर्माता बने शैलेन्द्र का रोम-रोम कर्जे में डूब गया था! इसके बावजूद वे ‘घर के आदमी’ के सामने मुंह खोलने की हिमाकत नहीं कर सकते थे, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त राज कपूर ने पारिश्रमिक के बिना ही काम करना जो मंजूर कर लिया था। आखिर किसी तरह फिल्म पूरी हुई तो अब इसके प्रदर्शन पर सवाल उठ खड़ा हुआ... वितरकों ने फिल्म देखी तो मुंह बिचका लिया- ‘हीरामन ने कसम खाई कि आगे से वह अपनी बैलगाड़ी में किसी बाई को नहीं बिठाएगा और फिल्म खत्म! इसमें कोई फाइट भी नहीं है!! यह कैसी फिल्म है?’ चर्चा है कि वे सभी एक स्वर में मांग करने लगे- ‘पहले जमींदार के कारिंदों द्वारा हीरामन की ढिशुम-ढिशुम कराओ, फिर हीरामन जब फाइट में घायल हो जाए तो हीराबाई उसे खून दे! ऐसे दो-चार सीन डालो, तभी यह फिल्म चल पाएगी।’
बहरहाल, इन वितरकों पर राज का जबर्दस्त प्रभाव होने के बावजूद वे लाभ दिलाने के मूड में नहीं थे तो भौंचक्के-से शैलेन्द्र को भी गवारा न था कि वे ‘रेणु’ की कहानी की यूं ‘हत्या’ करवा दें! सो, राज ‘संगम’ के लिए जब दोनों हाथों से पैसे बटोर रहे थे तो शैलेन्द्र की ‘तीसरी कसम’ डिब्बे में बंद थी। राज चाहते तो ‘तीसरी कसम’ रिलीज करवा कर शैलेन्द्र को कर्जे से मुक्ति भी दिला सकते थे, पर शायद ऐसा कर देते तो शैलेन्द्र को फिल्म बनाने की सजा भला कैसे मिलती! आखिर शैलेन्द्र ने खुद पहल की... अब वितरकों से बिना गारंटी का धन लिये उन्होंने फिल्म का प्रदर्शन करवा तो दिया, मगर प्रचार के अभाव में फिल्म बुरी तरह पिट गई तो शैलेन्द्र का दिल टूट गया! दरअसल, शैलेन्द्र को हैरानगी इस बात की भी थी कि कल तक जो लोग उनकी दोस्ती का दम भरते थे, आज वही उनके जले पर नमक छिड़कने लगे!!
जब वे सब शैलेन्द्र की पीठ में छुरा घोंप रहे थे, यह सब उनका कोमल कवि मन सह न सका और उन्होंने 14 दिसंबर, 1966 को यह दुनिया ही त्याग दी। कुछ समय बाद ‘तीसरी कसम’ को वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला... दर्शक जागे तो इसकी सराहना भी शुरू हो गई, पर तब तक सुदूर लोक में जा बैठे शैलेन्द्र के मन में एक ही टीस रही होगी- ‘काश, मुझे इस सम्मान का एक अंश भी जीते-जी मिल जाता तो मैं अभी पृथ्वीलोक को अलविदा ही नहीं कहता!’
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