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'पिता को शुक्रिया कहने की फिल्म है '21 तोपों की सलामी’

Dainik Bhaskar

Oct 07, 2014, 11:11 AM IST

टेलीविजनपर 'बड़े अच्छे लगते हैं', "पवित्र रिश्ता' और "मधुबाला’ जैसे सफल धारावाहिकों का निर्देशन करने वाले रविन्द्र गौतम अपनी पहली फिल्म लेकर रहे हैं। ये है "इक्कीस तोपों की सलामी’।

ikkis topon ki salami director interview
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मुंबई. टेलीविजन पर 'बड़े अच्छे लगते हैं', "पवित्र रिश्ता' और "मधुबाला’ जैसे सफल धारावाहिकों का निर्देशन करने वाले रविन्द्र गौतम अपनी पहली फिल्म लेकर रहे हैं। ये है "इक्कीस तोपों की सलामी’। इसमें अनुपम खेर, नेहा धूपिया, दिव्येंदु शर्मा, मनु ऋषि चड्‌ढा और अमन त्रिखा जैसे कलाकार नजर आएंगे।
कहानी समाज पर एक व्यंग्य है पर इसका उतना ही ध्यान पिता-पुत्र के अनूठे रिश्ते पर केंद्रित है। फिल्म के निर्माता अभिनव शुक्ला की भी ये पहली फिल्म है। दोनों अपने लिए भी इसे एक पर्सनल फिल्म बताते हैं। कहते हैं कि ये फिल्म उनकी ओर से अपने-अपने पिता को आदरजंलि है। इस शुक्रवार यानी 10 अक्टूबर को रिलीज हो रही इस फिल्म के सिलसिले में निर्माता-निर्देशक से मुलाकात हुई।

पढ़ें, निर्देशक रविन्द्र से बातचीत के अंश:

"इक्कीस तोपों की सलामी’ का आइडिया कैसे आया?
लेखक मुकुलअभयंकर के पास इसका विचार था। इसे सुनने के बाद अभिनव (निर्माता) ने तय किया कि ये उनकी पहली फिल्म होगी। कहानी दो बेटों की है जो अपने पिता की ईमानदारी को इक्कीस तोपों की सलामी दिलवाना चाहते हैं, तो हमने फिल्म का नाम यही रखा। रिसर्च के दौरान पता चला कि लोगों को पता ही नहीं कि "इक्कीस तोपों की सलामी’ का सही अर्थ क्या होता है। फिर तय कर लिया कि नाम यही रखेंगे।

कहानी का आपकी जिदंगी से भी कोई कनेक्शन है?
पहली फिल्म होने के कारण फिल्म बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन इससे भी बढ़कर पिता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का मेरा तरीका है। हमारे जमाने में पिता से सीमित बात होती थी। मैं मुंबई आया तो और भी कम बात होती थी। मुझे लगता था पिताजी खुश होंगे कि मेरा काम अच्छा चल रहा है, मैं उनका नाम रोशन कर रहा हूं। काम में व्यस्त होता गया तो सोचा कि एक बार सेटल हो जाऊं फिर परिवार के साथ भरपूर समय बिताऊंगा। मुझे उनसे दूरी तब समझ आई जब दो साल पहले अचानक उनकी मृत्यु हुई। लंबे वक्त बाद मैंने तब उनका हाथ पकड़ा था। मगर तब तक सारी बातें अधूरी छूट चुकी थीं। मां का त्याग दिखाई देता है लेकिन पिता का नहीं। जब पापा को ये बताने का वक्त आया तो वे ही दूर हो गए। ये कहानी मेरी नहीं हरेक की है। मेरे पिता को श्रद्धांजलि है ये फिल्म।

बैंकर थे,फिर टीवी शोज़ का निर्देशन करने लगे और अब ये ऑफ-बीट फिल्म बनाई है। ये बदलाव कितना जोखिम भरा रहा?
मेरी लाइफ में बिना रिस्क के कोई चीज नहीं आई। पढ़ने में रूचि नहीं थी लेकिन पेरेंट्स से वायदा किया था कि वे जो प्रतियोगी परीक्षा बोलेंगे, मैं पास करूंगा। दो परीक्षाएं दीं, दोनों में चुना गया और बैंक पीओ की जॉब लगी। भरोसा कम था जो थिएटर से जुड़ने के बाद बढ़ा। बैंकर का सुरक्षित करियर होने के कारण अपनी पसंद की लड़की से शादी कर ली लेकिन हीरो बनने की चाहत थी तो शादी के तुरंत बाद जॉब छोड़ मुंबई गया। शुरुआती संघर्ष के बाद धारावाहिक "उतरन’, "पवित्र रिश्ता’, "बड़े अच्छे लगते हैं’ बनाया। कोई कोर्स नहीं किया बल्कि आस-पास के लोगों से सीखा और काम करता गया। रिस्क से सराहना मिली।

अभिनव औरआपका टीवी से फिल्मों की तरफ पहला कदम है। कितना भरोसा है?
हमने टीवीशो "मधुबाला’ साथ में बनाया था। उनके पास "इक्कीस तोपों...’ की कहानी आई तो मुझे बुलाया। मैं धारावाहिक भी फिल्म की तरह बनाता था इसलिए अभिनव ने मुझसे निर्देशन के लिए कहा। पहले प्रोजेक्ट में अलग कहानी पर फिल्म बनाने वाले निर्माता कम होते हैं, मेरी खुशकिस्मती है कि अभिनव ने मुझे चुना।

अनुपम खेर के साथ काम करना कैसा रहा?
मैंने बचपनसे उनकी फिल्में देखी हैं। शुरू में उनका निर्देशन करना मुश्किल लग रहा था लेकिन उन्होंने मुझसे बहुत सी बातें करके सहज किया।

मनोरंजन और व्यंग्य के साथ हमारी फिल्म में सामाजिक संदेश भी है। इसके साथ ही फिल्म का पूरा ध्यान पिता-पुत्रों के रिश्तों पर है। स्क्रिप्ट लिखी जाते वक्त ही मुझे पूरा भरोसा था कि फिल्म उसी तरह से बनेगी जैसे हम सोच रहे हैं। बॉलीवुड में सटायर और अनूठे रिश्तों पर फिल्में कम ही बनती हैं, ये फिल्म उन चंद फिल्मों में से है। मेरे ही नहीं हर व्यक्ति के इमोशन इसमें शामिल हैं जो अपने पिता को दिल से शुक्रिया कहना चाहते हैं। निर्देशक गौतम और मेरा कंफर्ट लेवल टीवी के समय से बहुत मजबूत है, इसलिए "इक्कीस तोपों की सलामी’ को हम एक परफेक्ट फिल्म बना पाए हैं।-अभिनव शुक्ला, निर्माता

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