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‘शाहिद’ मानवीय करुणा का दस्तावेज

Dainik Bhaskar

Oct 19, 2013, 09:32 AM IST

हंसल मेहता की सत्य से प्रेरित फिल्म ‘शाहिद’ से हमारे सिनेमाई अफसानों के बादलों के बीच बिजली सी कौंध जाती है

jay praksh chaukse shahid movie review
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मुंबई के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता शाहिद आजमी के जीवन पर बनी फिल्‍म 'शाहिद' शुक्रवार को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। शाहिद आजमी की कुछ अज्ञात हमलावरों ने 2010 में उनके ही ऑफिस में घुस कर गोली मार कर हत्या कर दी थी। फिल्म में शाहिद आजमी का किरदार राजकुमार गुप्ता ने निभाया है। जाने-माने फिल्‍म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने इस फिल्‍म पर अपनी राय रखी है।
हंसल मेहता की सत्य से प्रेरित फिल्म ‘शाहिद’ से हमारे सिनेमाई अफसानों के बादलों के बीच बिजली सी कौंध जाती है और हमें लोमहर्षक अनुभव देती है। हमारे सौ साल के सिनेमा में अफसानों का संतुलन सामाजिक सोद्देश्यता वाली फिल्मों से करने के प्रयास हमेशा होते रहे हैं और इनका द्वंद्व सिनेमा की ऊर्जा भी रहा है। अगर हम बर्बर आतंकवादियों द्वारा कत्ल निर्दोष लोगों को एक पलड़े पर रखें और दूसरे पलड़े पर उन निर्दोष लोगों की यातना को रखें जिन्हें केवल पूर्वाग्रह के आधार पर जेलों में ठूंसा गया है तो हमें वर्तमान की सबसे भयावह त्रासदी का सही अंदाज होता है। दंगों में मरने वाले निर्दोष और छोटी सी शंका के कारण पकड़े गए लोग मानवीय यातना के दो चेहरे हैं और दर्द सारी तुलनाओं से परे होता है। न जख्म की जान होती है, न आंसू का कोई धर्म होता है।
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