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MOVIE REVIEW: राम-लीला

Dainik Bhaskar

Nov 15, 2013, 03:44 PM IST

'हम दिल दे चुके सनम' और 'देवदास' में सेट की भव्यता के अलावा जिस 'लार्जर दैन लाइफ' पिक्चर को भंसाली ने दर्शाया था, उसी की एक झलक दर्शकों को उनकी फ़िल्म 'रामलीला' में भी देखने को मिलेगी।

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एक खूबसूरत फ़िल्म बनाने की निर्देशक संजय लीला भंसाली की शैली से सभी वाकिफ़ हैं। 'हम दिल दे चुके सनम' और 'देवदास' में सेट की भव्यता के अलावा जिस 'लार्जर दैन लाइफ' पिक्चर को भंसाली ने दर्शाया था, उसी की एक झलक दर्शकों को उनकी फ़िल्म 'राम-लीला' में भी देखने को मिलेगी। एक मनोरंजक फ़िल्म के सभी मसालों का भंसाली ने इसमें अद्भुत सेटों के साथ बखूबी इस्तेमाल किया है।

कहानी: फ़िल्म की कहानी है राम (रणवीर सिंह) और लीला (दीपिका पादुकोण) की जो दो अलग-अलग कबीलों के खास घरानों के हैं। दोनों के कबीलों के लोग एक-दूसरे के जान के दुश्मन हैं और फूटी आंख नहीं सुहाते मगर प्यार कहां ये सब देखता है।जवान राम-लीला जब एक दूसरे को देखते हैं तो उनके बीच इश्क की चिंगारी इस कदर लगती है कि जो बुझाए नहीं बुझती। गुजरात का रोमियो (राम)बिंदास जूलियट (लीला) के प्यार में पड़ जाता है। एक तरफ दोनों कबीलों के लोग गोलियां बरसाकर अपनी पुराणी दुश्मनी की आग में जलते हैं वहीं इन्हीं गोलियों के बीच राम-लीला की रासलीला परवान चढ़ती है।

एक्टिंग: गांव की एक खूबसूरत लड़की को परदे पर कैसे दिखाना चाहिए? इसका जवाब तो आपको भंसाली की इस फ़िल्म में ही मिल सकता है। जहां पहली ही मुलाक़ात में लीला और राम के लिप-लॉक को दिखाया गया है। कठियावाड़ को लोगों को लीला के रूप में पहली बार अपने गांव की एक बोल्ड लड़की देखने को मिलेगी जिसे प्रेमी संग भागते, सेक्स करते, बगावत करते और शर्म और डर के बिना मनमर्ज़ी करते हुए दिखाया गया है। फ़िल्म में लीला ने केवल अपने प्यार का साथ दिया है, जहां हथियारों के बीच रहना तो उसके लिए रोज़ की बात है। दीपिका ने इस किरदार के लिए खासी मेहनत की है और यह बात फ़िल्म देखकर साफ झलकती है। उनका काम उम्दा है।
भंसाली की फिल्मों में शानदार सेटों, गांव की गलियों की खूबसूरती, आदि तो देखने को मिलती ही है, मगर इसमें केमिस्ट्री भी कुछ कम नहीं होती। रोमांटिक गानों की पृष्ठभूमि में रणवीर-दीपिका को अक्सर लिप-लॉक करते और एक बेडरूम दृश्य में भी दिखाया गया है। दर्शकों को लुभाने का 'हॉट एंड सिज़लिंग' फॉर्मूला भी तो आखिर यही है। रणवीर के सिक्स-पैक एब्स किसी जिम की देन नहीं बल्कि एक गांव के युवक की स्वाभाविक बलिष्ठ देह ही लगती है। लुक्स के अतिरिक्त भी अपने किरदार में डूब जाने के लिए की गई रणवीर कि मेहनत सराहनीय है। बेशक इस फ़िल्म से उनकी एक टैलेंटेड एक्टर की छवि बनेगी।
इस सबके बावजूद यह बात आपको चौंका सकती है कि फ़िल्म की असल ताकत न तो रणवीर हैं, और न ही दीपिका। सुप्रिया पाठक द्वारा निभाए गए धनकोरे के बेहतरीन किरदार के बिना फ़िल्म इतनी बढ़िया हो ही नहीं सकती थी।

निर्देशन: शानदार सेट ये एक ऐसी चीज़ है जिसमें संजय लीला भंसाली को महारत हासिल है। 'हम दिल दे चुके सनम' के बाद इस फ़िल्म में उन्होंने एक बार फिर खूबसूरत फ्रेम्स में रस-रंग के मिश्रण से तकनीक और कलात्मकता का अद्भुत संयोजन दिखाया है।

शानदार सेट, रंगारंग पृष्ठभूमि, खूबसूरत गानों और डांस सीक्वेंस के साथ गांव की सजी हुई घंटियों और पारंपरिक ढोल के बीच पैरों की थिरकन देखते ही बनती है। भंसाली की पहचान बन चुकी उनकी यह शैली आपको मुग्ध कर देने के लिए काफ़ी है।

लेकिन...

कुछ खामियां फिर भी इस खूबसूरत फ़िल्म में देखने को मिल सकती हैं। बंदूकों का तेज़ शोर, कुछ जगहों पर अस्पष्टता और बीच-बीच में अचानक ही आ जाने वाले गाने फ़िल्म का कमज़ोर पक्ष साबित हो सकते हैं। फ़िल्म में ड्रामा अगर भंसाली ने थोड़ा और सुधार लिया होता तो समीक्षकों की नज़र में भी यह फ़िल्म अच्छी हो सकती थी।

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